बिहार के शिक्षक संघर्षों के इतिहास में सबसे संगठित और जिद्दी हड़ताल का दुखद अंत हुआ। सतह पर तो कोरोना इसका प्रमुख कारण रहा परंतु पर्दे के पीछे बड़े राजनीतिक साजिश से इनकार नहीं किया जा सकता है। दोषी कौन है? कहां कमी रह गई? नियोजित शिक्षकों को उनका समुचित सम्मान मिल पाएगा या नहीं? यह सब तो अब वक्त तय करेगा। मगर जिस प्रकार से यह हड़ताल समाप्त हुआ और उसके बाद सरकार और विभाग की जैसी प्रतिक्रियाएं अब तक रही हैं इसको लेकर शिक्षक समुदाय के बड़े हिस्से के मन में बहुत आक्रोश है। यह आक्रोश आगामी चुनाव में क्या रंग दिखाएगा? यह कहना बहुत ही मुश्किल है।
नियोजित शिक्षकों से बात करने पर ऐसा लगता है कि विधान परिषद के चुनाव को वो सेमीफाइनल की तरह ले रहे हैं। स्नातक और शिक्षक दोनों ही सीटों पर इस बार शिक्षक मतदाताओं की संख्या लगभग 60 से 70% है। ऐसे में नियोजित शिक्षकों की नाराजगी वर्तमान परिषद सदस्यों के लिए बहुत भारी पड़ने वाली है। नियोजित शिक्षकों का एक बड़ा तबका सरकार द्वारा अपेक्षित पहलकदमी नहीं लेने की स्थिति में राजनीतिक हस्तक्षेप पर आमदा दिखता है।
बिहार में विधानसभा चुनाव की रणभेरी भी बज चुकी है। वैसे तो अंतिम बिसात बिछनी अभी बाकी है और बिहार को राजनैतिक दलों के बीच कई नये समीकरण देखने को तैयार रहना चाहिए। नियोजित शिक्षकों के लिए सबसे अधिक चिंता का विषय यह है कि सरकार कुछ स्पष्ट नहीं कर रही, वार्ता तक पर कोई सुगबुगाहट नहीं है , जबकि सरकार से खुलकर नाराजगी दिखाने के बावजूद मुख्य विपक्षी दल भी अभी तक नियोजित शिक्षकों के पक्ष में खुलकर स्टैंड नहीं रख पाया है। ऐसा लगता है कि उन्होंने भी विकल्प के अभाव में नियोजित शिक्षकों को ग्रांटेड ले रहा है।
एनडीए की तरफ से देश के गृहमंत्री ने बिहार के वर्तमान मुखिया श्री नीतीश कुमार जी के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है मगर भाजपा के कार्यकर्ताओं के मन में उहापोह की स्थिति है। बिहार की जमीनी हकीकत और हवा श्री नीतीश कुमार के विरुद्ध है, ऐसे में कार्यकर्ताओं को डर सता रहा है कि नीतीश जी के चक्कर में कहीं भाजपा भी न डूब जाए।
महागठबंधन में तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनता दल का व्यवहार एकला चलो रे के अंदाज में है, उन्हें ऐसा लगता है की नीतीश सरकार के विरुद्ध आक्रोश का सीधा लाभ उन्हें मिलेगा और इसी लहर पर वे सत्ता में आ जाएंगे। जिसके कारण वो महागठबंधन में शामिल छोटी पार्टियों को ज्यादा भाव नहीं दे रहे हैं।
श्री जीतन राम माझी के नेतृत्व में महागठबंधन का एक हिस्सा नए राजनीतिक समीकरणों के तलाश में दिखता है। दलित अधिकारों को लेकर जीतन राम मांझी के नेतृत्व में जिस तरीके से दलित नेताओं का अभियान शुरू हुआ है वह बिहार में एक नई राजनीतिक संभावना को जन्म दे रहा है।
नई राजनीतिक सनसनी पुष्पम प्रिया चौधरी , कन्हैया कुमार एवं पप्पू यादव भी काफी पसंद किए जा रहे हैं। सूत्रों से पता चला है कि आम आदमी पार्टी भी बिहार के चुनाव में हाथ आजमाने की तैयारी कर रही है।
वामपंथी दलों ने भी अपना पत्ता नहीं खोला है कि वो इस बार के विधानसभा चुनाव में अपनी क्या भूमिका देखते हैं ? वो एक अलग मोर्चे के रूप में चुनाव में जाएंगे या किसी गठबंधन के साथ ।
इन परिस्थितियों में आगामी दिनों में बिहार में क्या गुल खिलेगा ? क्या सरकार उनको मनाने में कामयाब होगी ?अगर सरकार शिक्षकों को संतुष्ट नहीं कर पाई , तो नियोजित शिक्षक क्या हड़ताल की तरह एकजूट होकर सरकार के विरुद्ध निर्णायक भूमिका निभाएंगे ? क्या कार्यकर्ताओं के दवाब में भाजपा जदयू से अलग चुनाव लड़ने का जोखिम उठाने को तैयार होगी ? क्या फिर से जदयू - राजद गठबंधन होगा ? क्या बिहार इस बार त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय मुकाबला देखेगा ? वैसे चुनावी चकल्लस शुरू है और इस सबके बीच , बिहार में सार्वजनिक शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, पलायन, रोजगार आदि जरूरी मुद्दे पीछे छूटते दिख रहे हैं।
इन प्रश्नों का उत्तर तो भविष्य के गर्भ में है । तब तक तो मेरा यायावर मन इन गलियों में घूमता हीं रहेगा।












