बुधवार, 10 जून 2020

नियोजित शिक्षकों का हित और बिहार का चुनावी चकल्लस


बिहार के शिक्षक संघर्षों के इतिहास में सबसे संगठित और जिद्दी हड़ताल का दुखद अंत हुआ। सतह पर तो कोरोना इसका प्रमुख कारण रहा परंतु पर्दे के पीछे बड़े राजनीतिक साजिश से इनकार नहीं किया जा सकता है। दोषी कौन है? कहां कमी रह गई? नियोजित शिक्षकों को उनका समुचित सम्मान मिल पाएगा या नहीं? यह सब तो अब वक्त तय करेगा। मगर जिस प्रकार से यह हड़ताल समाप्त हुआ और उसके बाद सरकार और विभाग की जैसी प्रतिक्रियाएं अब तक रही हैं इसको लेकर शिक्षक समुदाय के बड़े हिस्से के मन में बहुत आक्रोश है। यह आक्रोश आगामी चुनाव में क्या रंग दिखाएगा? यह कहना बहुत ही मुश्किल है।
नियोजित शिक्षकों से बात करने पर ऐसा लगता है कि विधान परिषद के चुनाव को वो सेमीफाइनल की तरह ले रहे हैं। स्नातक और शिक्षक दोनों ही सीटों पर इस बार शिक्षक मतदाताओं की संख्या लगभग 60 से 70% है। ऐसे में नियोजित शिक्षकों की नाराजगी वर्तमान परिषद सदस्यों के लिए बहुत भारी पड़ने वाली है। नियोजित शिक्षकों का एक बड़ा तबका सरकार द्वारा अपेक्षित पहलकदमी नहीं लेने की स्थिति में राजनीतिक हस्तक्षेप पर आमदा दिखता है।

बिहार में विधानसभा चुनाव की रणभेरी भी बज चुकी है। वैसे तो अंतिम बिसात बिछनी अभी बाकी है और बिहार को राजनैतिक दलों के बीच कई नये समीकरण देखने को तैयार रहना चाहिए। नियोजित शिक्षकों के लिए सबसे अधिक चिंता का विषय यह है कि सरकार कुछ स्पष्ट नहीं कर रही, वार्ता तक पर कोई सुगबुगाहट नहीं है , जबकि सरकार से खुलकर नाराजगी दिखाने के बावजूद मुख्य विपक्षी दल भी अभी तक नियोजित शिक्षकों के पक्ष में खुलकर स्टैंड नहीं रख पाया है। ऐसा लगता है कि उन्होंने भी विकल्प के अभाव में नियोजित शिक्षकों को ग्रांटेड ले रहा है।

एनडीए की तरफ से देश के गृहमंत्री ने बिहार के वर्तमान मुखिया श्री नीतीश कुमार जी के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है मगर भाजपा के कार्यकर्ताओं के मन में उहापोह की स्थिति है। बिहार की जमीनी हकीकत और हवा श्री नीतीश कुमार के विरुद्ध है, ऐसे में कार्यकर्ताओं को डर सता रहा है कि नीतीश जी के चक्कर में कहीं भाजपा भी न डूब जाए।

महागठबंधन में तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनता दल का व्यवहार एकला चलो रे के अंदाज में है, उन्हें ऐसा लगता है की  नीतीश सरकार के विरुद्ध आक्रोश का सीधा लाभ उन्हें मिलेगा और इसी लहर पर वे सत्ता में आ जाएंगे। जिसके कारण वो महागठबंधन में शामिल छोटी पार्टियों को ज्यादा भाव नहीं दे रहे हैं।
श्री जीतन राम माझी के नेतृत्व में महागठबंधन का एक हिस्सा नए राजनीतिक समीकरणों के तलाश में दिखता है। दलित अधिकारों को लेकर जीतन राम मांझी के नेतृत्व में जिस तरीके से दलित नेताओं का अभियान शुरू हुआ है वह बिहार में एक नई राजनीतिक संभावना को जन्म दे रहा है।

नई राजनीतिक सनसनी पुष्पम प्रिया चौधरी , कन्हैया कुमार एवं पप्पू यादव भी काफी पसंद किए जा रहे हैं। सूत्रों से पता चला है कि आम आदमी पार्टी भी बिहार के चुनाव में हाथ आजमाने की तैयारी कर रही है।
वामपंथी दलों ने भी अपना पत्ता नहीं खोला है कि वो इस बार के विधानसभा चुनाव में अपनी क्या भूमिका देखते हैं ? वो एक अलग मोर्चे के रूप में चुनाव में जाएंगे या किसी गठबंधन के साथ ।
इन परिस्थितियों में आगामी दिनों में बिहार में क्या गुल खिलेगा ? क्या सरकार उनको मनाने में कामयाब होगी ?अगर सरकार शिक्षकों को संतुष्ट नहीं कर पाई , तो नियोजित शिक्षक क्या हड़ताल की तरह एकजूट  होकर सरकार के विरुद्ध निर्णायक भूमिका निभाएंगे ? क्या कार्यकर्ताओं के दवाब में भाजपा जदयू से अलग चुनाव लड़ने का जोखिम उठाने को तैयार होगी ? क्या फिर से जदयू - राजद गठबंधन होगा ? क्या बिहार इस बार त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय मुकाबला देखेगा ? वैसे चुनावी चकल्लस शुरू है और इस सबके बीच , बिहार में सार्वजनिक शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, पलायन, रोजगार आदि जरूरी मुद्दे पीछे छूटते दिख रहे हैं।

इन प्रश्नों का उत्तर तो भविष्य के गर्भ में है । तब तक तो मेरा यायावर मन इन गलियों में घूमता हीं रहेगा।

शुक्रवार, 15 मई 2020

आम-बजट (2020-2021):और उपेक्षित स्कूली शिक्षा और शिक्षक



वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने,1 फरवरी 2020 को मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का दूसरा आम-बजट (2020-2021)पेश किया ,2.39 घंटा का अब तक का सबसे लम्बा बजट भाषण पढ़ा।
भारत को वैश्विक शिक्षा केन्द्र बनाने के लिए वित्त मंत्री ने शिक्षा के लिए 99.300करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है,लेकिन भारी खेद का विषय यह है क़ी अपने ढाई घंटे के लंबे भाषण के दौरान, वित्त मंत्री ने स्कूली शिक्षा का अलग से उल्लेख तक नहीं किया, इस तथ्य के बावजूद कि लाखों बच्चे अभी भी स्कूल से बाहर हैं, मौजूदा बजट न केवल शिक्षा के मौलिक अधिकार कानून 2009 के जमीनी क्रियान्वयन व विस्तार के प्रति सरकार की गैर जवाबदेही एवं ढुलमुल रवैये का परिचायक है बल्कि यह  स्कूली शिक्षा में सुधार के लिए सरकार द्वारा लगातार किये जा रहे सतही दावों और गरीब आम जनता की शिक्षा के क्षेत्र में भागीदारी के प्रति उदासीन नजरिए की भी पोल खोल देता है।
सरकार पूर्व प्राथमिक से उच्चतर माध्यमिक शिक्षा (3-18 वर्ष) तक शिक्षा अधिकार कानून 2009 के विस्तार करने का इरादा रखती है, जैसा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे में सिफारिश की गई है तो उसे पर्याप्त बजट मुहैया कराना ही होगा।
अभी भी बच्चों की एक बड़ी संख्या (जनगणना 2011 के मुताबिक 8.4 करोड़ बच्चे स्कूल के बाहर है, देश भर में 10.1 लाख शिक्षकों की कमी है, तकरीबन 2 लाख सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं और विलय के नाम पर तमाम राज्यों में सरकारी स्कूलों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है. लगभग 1लाख स्कूल 1 शिक्षक के भरोसे चल रहा है।
शिक्षा अधिकार कानून, 2009 के लागू होने के तकरीबन एक दशक होने को आये हैं लेकिन सरकारी स्कूलों में से केवल 13 फीसदी में ही अभी आरटीई के प्रावधान लागू हो सके हैं. ऐसे में शिक्षा को लेकर सरकार की प्राथमिकता और कोई ठोस रोडमैप बनाने के प्रति उदासीनता सहज ही समझी जा सकती है.
बजट अभिभाषण में शिक्षा के डिजिटलाइजेशन और ऑनलाइन पाठ्यक्रम  की बात कही जा रही है लेकिन हकीकत ये है कि बजट के मोर्चे पर शिक्षा के प्रति लगातार उपेक्षा दलित-वंचित, अल्पसंख्यक समेत गरीब, हाशिये के समुदायों और लड़कियों की शिक्षा पर सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव डालेगी। “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” का नारा देने वाली और 2014 में सत्ता में आने से पहले अपने घोषणा-पत्र में शिक्षा पर 6 फीसदी खर्च का वायदा करने वाली सरकार जब इस तरह के बजट की घोषणा करती है तो 2030 तक उच्चतर माध्यमिक शिक्षा (एसडीजी लक्ष्य 4) को सार्वभौमिक बनाने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता का अंदाज लगाया जा सकता है।
स्कूली शिक्षा के लिए महज 59845 करोड़ रुपये (पिछले वर्ष के 56386 करोड़ में से केवल 3459 करोड़ रुपये की न्यूनतम वृद्धि) के बल पर शिक्षा के सर्वव्यापीकरण के लक्ष्य को हासिल करना कतई असंभव है।
बिहार के सन्दर्भ में देखे तो जँहा की शिक्षा की स्थिति देश के सबसे निचले पावदान पे है ना तो मानक(RTE 30:1और 35:1)के हिसाब से शिक्षक है,और ना शिक्षको को आर्थिक निर्वाह करने के अनुरूप वेतन,या तो यहां शिक्षको को कई महीनों तक वेतन ही नही मिलता या मिलता भी है तो सरकार द्वारा निर्धारित आधा अधूरा,यधपि सरकार ने कागजो पे दक्ष शिक्षको हेतु शैक्षणिक मानक के हिसाब नियुक्त तो कर लिया गया है लेकिन नियोजन जैसे नाम के साथ, जिसमे आधी अधूरी वेतनमान(देश के बाकी राज्यो में जंहा पूर्णवेतनमान है वही बिहार के RTE अनुरूप शिक्षको का आधा अधूरा वेतनमान )दी जाती है,आंदोलनों के माध्यम से कई बार सवाल भी उठाए जाते रहे है जब काम समान तो वेतन समान क्यों नही,अर्थात समान काम का सामान वेतन शिक्षक RTE के अनुरूप तो वेतन बाकी राज्य के RTE अनुरूप दक्ष शिक्षको जैसा क्यों नही।ऐसे में कम वेतन पाने के कारण शिक्षको के ऊपर जीवकोपार्जन हेतु अर्थिक तंगी का मनोवैज्ञानिक दबाब बना रहता है,जसके कारण अपनी क्षमता का चाह कर भी भरपूर उपयोग नही कर पाते,क्योंकि अच्छे से अच्छे ईंजन में अच्छा ईंधन ना डाला जए तो उच्च किस्म का ईंजन भी अपनी क्षमता के अनुरूप कार्य नही कर पाता।
ऐसे में ज्ञान की धरती बिहार को पुनः ज्ञानिक धरा नामकरण होने की बात अब केवल दिवास्वप्न ही लगती है,और भारत के विश्व गुरु होने की बात कोरी कल्पना मात्र।

जंहा तक नई तकनीक(ऑनलाइन)
शिक्षा की बात है तो शहरी क्षेत्र के ए•सी और कॉन्वेंट के विद्यार्थियों का जो पूरी तरह से नए टेक्नोलॉजी गैजेट से लैस होते है,ऑनलाइन माध्यम से पढ़ाई पुरी होने में कोई विशेष समस्या नही दिखाई देती लेकिन
हमारे देश की बहुसंख्य जनसंख्या जो ग्रामीण क्षेत्र (खास कर बिहार ) में अपनी  स्कूली शिक्षा पूरी करते है,असल समस्या उनके साथ होती है।
 ग्रामीण स्तर के छात्र- छात्राए  वो ना तो टेक्नोलॉजी से पूर्ण होते है और ना ही आर्थिक सम्पन्नता इतनीं होती है  की नई टेक्नोलॉजी के लिए गैज़ट (ऑनलाइन शिक्षा के उपयोग में आने वाले स्मार्ट मोबाइल,इंटरनेट डेटा पैक,ना तकनीकी ज्ञान) को वाहन कर सके।
ऐसे में  ग्रामीण स्तर के विद्यार्थियों को ऑनलाइन शिक्षा एक मिथ्या सत्य के अलावे कुछ नही लगता।
विद्यालय के स्तर पर भी देखे तो ग्रामीण विद्यालय ना तो पूरी तरह अभी डिजिटिलाइजड है औऱ ना ही विद्यालय में दक्ष शिक्षक,या तो बहाली के कारण शिक्षको की भारी कमी है या है भी तो वो तकीनीकी रूप से  पूरी तरह दक्ष नही है, वहा डिज़िलाईटेशन औऱ ऑनलाइन एडुक्शन प्रोग्राम सुचारु रूप से चलने पे प्रश्न चिन्ह खड़ा हो जाता हैं! इसलिय केवल डिज़िलाईटेशन औऱ ऑनलाइन शिक्षा पर फोकस करने से काम नही चलेगा जरूरत है,अभी धीरे-धरे स्कूली शिक्षा को  मैन्युअलि रूप से मजबूत करना जिससे भारत जैसे  बड़े  जनसंख्या वाले देश मे मानव संसाधन का भरपूर उपयोग भी हो पायेगा,तथा बेरोजगारी भी दूर होगी तब कही डिजिटिलाइज की ओर धिरे - धिरे आगे बढ़ना होगा,वरना शिक्षको के आधे अधूरे वेतनमान और सार्वजनिक शिक्षा की कमजोर बुनियाद पर घोषित डिजिटलाइजेशन और ऑनलाइन पाठ्यक्रम गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के बजाय भेदभावपूर्ण शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करेंगा*।


✍🏻....लेखक परिचय

*नीरज कुमार* मूलतः जिला सिवान बिहार के रहने वाले है,स्कूली शिक्षा धनबाद(झारखंड)से पूरी की है
टीचर्स ऑफ बिहार में ब्लॉगर है
इन्होंने  काशी हिंदू विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एम•ए किया है,राजनीति विज्ञान और अंतरष्ट्रीय संबन्ध से राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा NET उतीर्ण है।
इन्होंने CTET,BTET,JTET परीक्षा भी  उतीर्ण की है तथा इन्हें अरविंदो सोसाइटी के तरफ से
शून्य नवाचार के लिय पुरस्कृत भी किया गया है।
वर्तमान में पटना पालीगंज में सरकारी शिक्षक के पद  पर पदस्थापित हैं।

शनिवार, 9 मई 2020

मरूभूमि बना बिहार , संपूर्ण क्रांति आंदोलन अब संभव नहीं !

सार्वजनिक_शिक्षा_और_स्वास्थ्य के साथ सार्वजनिक परिवहन जैसी मौलिक आवश्यकता की सुविधाओं के लचर होने, रोजगार और कृषि क्षेत्र में सुविधाओं के अभाव के बावजूद देश या बिहार का नागरिक समाज या छात्र - युवा आंदोलित क्यों नहीं हो रहा ? बुद्धिजीवी वर्ग और नागरिक समाज सबके सब चुपचाप क्यों बैठे हैं ? कभी सोचा है आपने ?  आइए जरा इन तथ्यों पर गौर करें-

सपूर्ण_क्रांति_आंदोलन का प्रसार बिहार से शुरू होकर पूरे देश को प्रभावित करने में सफल हुआ। देश के तमाम राज्यों सहित केन्द्रीय सत्ता में भी परिवर्तन का कारण बना। इसी प्रकार इस आंदोलन के निहितार्थ ने भी राष्ट्रीय स्तर अपना प्रभाव छोड़ा। सभी राजनीतिक दलों ने इन इस आंदोलन के निहितार्थों से सीख लिया होगा। कांग्रेस तो खैर उस आंदोलन से प्रभावित हीं हुई थी पर निश्चित रूप से सफल हुए राजनीतिक समूहों ने भी सफलता के कारकों पर विचार किया होगा। तब से आज तक लगभग सभी ने बारी बारी से राज्यों से लेकर केन्द्र तक शासन किया है। आज भी कमोबेश पूरे भारत में संपूर्ण क्रांति की उपज हीं शासन कर रहे हैं। संपूर्ण क्रांति आंदोलन के बाद एक बहुत मजेदार तथ्य उभरकर सामने आया है वो यह कि भारत में मौजूद सभी राजनीतिक दलों के बीच लाख असहमतियों के बावजूद कुछ बातों के लिए जबरदस्त सहमति है उनमें से प्रमुख हैं , #जनता_की_निष्ठा खरीदने के लिए राजकीय कोष का दुरूपयोग करने की छूट , #अपने_सुविधाओं में मनमानी बढ़ोतरी के लिए अविश्वसनीय एकता तथा #येन_केन_प्रकारेण जनता को बांट कर सत्ता का पासिंग द बॉल का खेल खेलना। हकीकत यही है कि उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे सत्ता में हैं या विपक्ष में। सारी धींगामुश्ती सिर्फ अपने-अपने समर्थकों को अपने पाले में रखकर नागरिकों को बांटे रखने की है।

#बिहार_में_भी_सम्पूर्ण_क्रांति के छात्र और नागरिक आंदोलन की उपज , छात्रों , शिक्षित बुद्धिजीवियों और नागरिकों के एकीकृत आंदोलन की ताकत समझ गए थे। इसलिए अपनी सत्ता को बरकरार रखने के लिए पहले तो इन लोगों ने नागरिकों को खंड खंड में विभाजित किया तथा छोटे छोटे लाभ देकर नैतिक रूप से कमजोर किया। प्रतिक्रियात्मक रुप से अलग अलग ध्रुव बन गए। क्रमशः #हम_भारत_के_लोग, नागरिक से समर्थक और विरोधी बनते चले गए ।
दूसरी तरफ छात्रों को कमजोर करने के लिए शिक्षा के स्तर को गिराया गया , साथ हीं शिक्षा पद्धति को भी वस्तुनिष्ठ बनाकर विश्लेषण की पूरी क्षमता को खत्म कर दिया । शैक्षणिक संस्थानों को डिग्री बांटने और उसके बाद वोट बैंक को लुभाने वाला केन्द्र बना दिया गया। विस्तृत दृष्टि के अभाव में सामाजिक विभाजन गहरा प्रभाव इन पर भी पड़ता चला गया। इन सबके कारण छात्र अब विचार नहीं करते , बस दिए गए विचारों का प्रसार करते हैं।
#छात्रों_और_प्रबुद्ध वर्ग के लोगों और नागरिकों को लोकतांत्रिक राजनीतिक दलों और उनके द्वारा पोषित मिडिया वर्ग द्वारा #वोट_बैंक के रूप में संबोधित करके किया जाने वाला अपमान समझ में आता है भी या नहीं ? बैंक तो समझ आता है ना ? आप उनके बैंक खाते में जमा वोट हैं , तात्पर्य यह कि आप उनकी संपत्ति है , नागरिक समाज धीरे धीरे इनके जाल में उलझकर #भारतीय_संविधान_की_प्रस्तावना के पहले पंक्ति में वर्णित #हम_भारत_के_लोग नहीं रहे ।
#राजनीतिक_दलें मदारियों की तरह , जाति , धर्म , राष्ट्र , क्षेत्रिय/भाषाई अस्मिता आदि तरह तरह के मनभावन तमाशों में हमें उलझाकर , अपने समुदाय ( राजनैतिज्ञ) के लिए स्वार्थसिद्धि  का मार्ग निष्कंटक बनाने में सफल हो जाते हैं।
#नागरिक_समाज_अपने_ही_पूर्वजों द्वारा दी गई शिक्षा को भूल गए। महाराणा प्रताप, शिवाजी, बाबू कुंवर सिंह , झांसी की रानी, मंगल पांडे के साथ-साथ बहादुर शाह जफर के संघर्ष को भूल गए। चाणक्य की शिक्षाओं को भूल गए। महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, चंद्र शेखर आजाद, बल्लभ भाई पटेल और भगत सिंह के संघर्षों को भूल गए। सामाजिक उत्थान के लिए पेरियार और ज्योतिबा फूले द्वारा दी गई शिक्षाओं को भूल गए हैं तो वहीं मदन मोहन मालवीय और सैयद अहमद खान द्वारा बताए गए शिक्षा के महत्व को भी भूल गए हैं। बाबासाहेब आंबेडकर के संघर्षों को भूल गए हैं उनके द्वारा उपलब्ध कराए गए संवैधानिक अधिकारों को भूल गए हैं। डॉ राजेंद्र प्रसाद और जयप्रकाश नारायण का दृढ़ निश्चय भूल गए हैं। रामधारी सिंह दिनकर , दुष्यंत और गोपाल सिंह नेपाली के संघर्षों का आह्वान भूल गए हैं।

वक्त आ गया है कि भारत के नागरिक एक बार फिर अपने इन पूर्वजों के द्वारा दी गई शिक्षाओं को याद करें , उस पर अमल करें क्योंकि उनके द्वारा बताए गए मार्ग पर चलकर ही आप अपने समाज , राज्य और देश को सशक्त बना सकते हैं , विकसित बना सकते हैं।

अमित कुमार

गुरुवार, 7 मई 2020

क्या बन्द कर दिए जाएंगे सरकारी विद्यालय ?



नीचे👇 दिनांक 03-05-2020 को दैनिक जागरण छपा हुआ एक आलेख आप सबों के विचारार्थ प्रस्तुत है। हो सकता है कि आप में से बहुत सारे साथियों ने इसे देखा होगा पर एक बार पहले ध्यान से पढ़ लें , घेरे वाले भाग को विशेष रूप से। अब आगे जो लिखूंगा उसे पेपर कटिंग पढ़ने के बाद पढ़िएगा।

पढ़_लिया_आपने? इस आलेख को लिखा है जाने माने अर्थशास्त्री भरत झुनझुनवाला जी ने। ये महाशय सरकारों के नीतियों को प्रभावित भी करते हैं और टुकड़े टुकड़े में उसको प्रचारित कर वातावरण निर्माण भी करते हैं। पढ़ लिया आपने कि किस प्रकार ये शिक्षा के पूर्णतः निजीकरण की वकालत कर रहे हैं। अब कुछ दिन पीछे जाकर इस साल के लिए बजट प्रस्तुत करते हुए केन्द्रीय वित्त मंत्री का संसद में दिया गया बजट भाषण याद करें। स्वास्थ्य में PPP( पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) मॉडल और शिक्षा में FDI (फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट) लागू करने की घोषणा हुई थी। कोरोना काल में जब जनता जीवन के आपाधापी में उलझी है। निम्न और निम्न मध्यम वर्ग के शिक्षा के केन्द्र सरकारी विद्यालयों को समाप्त करने के विमर्श को आगे बढ़ाया जा रहा है । कुछ लोग कहेंगे कि तो क्या समस्या है ? गरीबों को को मुफ्त वाउचर देने की बात भी तो हो रही है । ये तो और अच्छी बात है कि गरीब भी प्राइवेट स्कूलों में पढ़ेंगे । ऐसे लोगों से सिर्फ एक बात पूछना चाहता हूं कि वो जरा पता करके बताएं कि RTE(शिक्षाका अधिकार अधिनियम) के तहत जो निर्धन बच्चों को 25% सीट प्राइवेट स्कूलों में देने की बात कही गई है, वो कहां - कहां मिल रहा है ? एक तो ये मुफ्त वाउचर भी कितना मिलेगा? और अगर मिलेगा भी तो डाईरेक्ट बेनिफिट के अन्य राशियों की तरह इसका कितना सदुपयोग होगा? यह विचारणीय है।
श्रीमान झुनझुनवाला जी की यह सोच उनकी और उन नीतियों की एक झलक भर है जिनका वो प्रतिनिधित्व करते हैं। वो सरकारी विद्यालयों को समाप्त कर नीति विद्यालयों में शिक्षा को इसलिए बढ़ाना चाहते हैं कि सेवा क्षेत्र को उपयोगी कर्मी मिल सकें। इस बात का दूसरा अर्थ यह भी निकलता है कि उनके अनुसार अर्थव्यवस्था के प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूर वर्ग के लोगों को शिक्षा की आवश्यकता नहीं है। नीतियां यह संकेत दे रही हैं कि अर्थव्यवस्था आधार स्तंभ कामगार अब मूलतः दो भागों में विभक्त हो रहे हैं । पहला मजदूर (अकुशल श्रमिक ) और दूसरे सेवा क्षेत्र के कामगार ( कुशल श्रमिक)। सेवा क्षेत्र का मतलब है बाबू , प्रतिनिधि ।बस इनकी हीं आवश्यकता है खुली अर्थव्यवस्था के दौर में आधुनिक राजाओं रजवाड़ों (जिसमें राजनीतिक वर्ग से लेकर औधोगिक घराने तक शामिल हैं) को । श्री झुनझुनवाला बस उसी विचार को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं जिसकी खुली घोषणा माननीय प्रधानमंत्री जी ने इस बार चुनाव जीतने के बाद संसद के सेंट्रल हॉल में दिए गए पहले भाषण में की थी कि अब भारत में दो हीं वर्ग या दो हीं जाति रहेंगे , एक रोजगार पाने वाला और दूसरा रोजगार देने वाले।
यह बिहार के एक सरकारी विद्यालय की हीं तस्वीर है।

बुद्धिजीवी वर्ग, नागरिक समाज और हमारे शिक्षक भी शायद भविष्य की भयावहता का आकलन नहीं कर रहे हैं। देश सचमुच बदल रहा है। यहां अब नागरिक के लिए कोई जगह नहीं बची रही है। रहेगी तो बस नौकर और मालिक की व्यवस्था। अब इस व्यवस्था के मौलिक तत्वों को आप बेहतर समझ सकते हैं। अब सार्वजनिक शिक्षा के केन्द्र सरकारी विद्यालयों को बचाना है या नहीं ?  निर्णय आपको करना है ।

शनिवार, 2 मई 2020

शिक्षक, मजदूर शहीदों एवं कोरोना के विरुद्ध योद्धाओं को हड़ताली शिक्षकों ने दी श्रृद्धांजलि


▪ हड़ताली शिक्षकों ने मनाया मजदूर दिवस
▪ शिक्षक एवं मजदूर आंदोलनों के शहीदों की दी श्रधांजली
▪ हकमारी के खिलाफ संघर्ष का लिया संकल्प
▪ सहायक शिक्षक- राज्यकर्मी का दर्जा व पूर्ण वेतन एवं सेवाशर्त को लेकर ढ़ाई महीने से हड़ताल पर हैं शिक्षक
▪ गांव- गांव में क्वारेंटाइन सेंटर नियोजित शिक्षकों के बगैर चलाना असंभव
▪ हड़ताल पर जारी गतिरोध को सकारात्मक पहल के जरिये सुलझा सकती सरकार
▪ दमन के खिलाफ शिक्षकों में सुलग रहा आक्रोश
▪ भेदभावपूर्ण नीतियों के खिलाफ गांव गांव में होगा पोल खोल

पटना/ 01 मई+02 मई 2020/ हड़ताल पर सरकार की बेरुखी और दमनात्मक रवैये के खिलाफ सूबे के टीइटी एसटीइटी शिक्षकों ने अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के मौके पर
संघर्ष मजबूत करने का संकल्प लिया| इस दौरान नियोजित शिक्षकों ने लॉकडाउन का पालन करते हुए अपने अपने घरों में दीप प्रज्वलित कर शिक्षक एवं मजदूर आंदोलनों के शहीदों को श्रधांजली दी| शिक्षकों ने हड़ताल व अपने मुद्दे के समर्थन में सोशल मीडिया पर हैशटैग लगाकर अपने गतिविधियों की तस्वीरें भी शेयर की है| गौरतलब है कि सहायक शिक्षक- राज्यकर्मी का दर्जा व पूर्ण वेतन एवं सेवाशर्त को लेकर ढ़ाई महीने से सूबे के चार लाख नियोजित शिक्षक हड़ताल पर हैं| राज्य सरकार हड़ताल के मसले पर शिक्षक प्रतिनिधियों से वार्ता करने के बजाय दमनात्मक पत्र निकालकर आंदोलन को दबाने की रणनीति पर चल रही है| सहायक शिक्षक- राज्यकर्मी का दर्जा, पूर्ण वेतन व सेवाशर्त एवं कारवाई वापसी और सामंजन जैसे महत्वपूर्ण मसले पर बात करने के बजाय सरकार नियोजित शिक्षकों को डंडों से हांकना चाह रही है| हड़ताल के दौरान पैंसठ नियोजित शिक्षकों की मौत हो चुकी है जबकि पचीस हजार से भी अधिक शिक्षक निलंबन बर्खास्तगी व प्राथमिकी की कारवाई झेल रहे हैं| प्रवासी मजदूरों की वापसी के संकेतों ने सरकार के लिए गांव गांव में क्वारेंटाईन सेंटर की अपरिहार्यता तय की है लिहाजा उन केंद्रों पर बड़े पैमाने पर कर्मियों की जरूरत है| गांव- गांव में क्वारेंटाइन सेंटर नियोजित शिक्षकों के बगैर चलाना असंभव दिख रहा है| सरकार शिक्षक प्रतिनिधियों से बात करके हड़ताल को समाप्त कराने को लेकर गंभीर नही दिख रही है| नियोजित शिक्षक भी वार्ता के बगैर हड़ताल में बने रहने को बाध्य हैं|
समन्वय समिति कोरटीम के सदस्य और टीइटी एसटीइटी उत्तीर्ण नियोजित शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष मार्कंडेय पाठक ने बताया कि शिक्षक दमन से डरकर भागनेवाले नही हैं | दमन और बेरुखी के खिलाफ नियोजित शिक्षकों के भीतर आक्रोश सुलग रहा है| हड़ताल पर जारी गतिरोध को सरकार सकारात्मक पहल के जरिये सुलझा सकती है| लेकिन विभागीय आलाअधिकारियों के मंसूबे शिक्षकों के संघर्षों को ऐन केन प्रकारेण दबाने का ही दिखता है| भेदभाव के खिलाफ लड़ रहे शिक्षकों के साथ सरकार की चरम संवेदनहीनता के खिलाफ शिक्षक भी चुप नही बैठनेवाले हैं| शिक्षक , गांव - गांव में शासन प्रशासन व नीतियों के मोर्चे पर सरकार की विफलता का पोल खोलने की तैयारी कर रहे हैं|
प्रदेश सचिव अमित कुमार शाकिर इमाम नाजिर हुसैन और प्रदेश प्रवक्ता अश्विनी पांडेय ने कहा कि कोरोना महामारी के खिलाफ मुकम्मल मुहिम नियोजित शिक्षकों की भागीदारी के बगैर चलाना असंभव है| सरकार हठधर्मिता छोड़े- शिक्षक प्रतिनिधियों से सहायक शिक्षक- राज्यकर्मी का दर्जा, पूर्ण वेतन व सेवाशर्त एवं कारवाई वापसी और सामंजन जैसे महत्वपूर्ण मसले पर सकारात्मक बातचीत आगे बढ़ाते हुए हड़ताल समाप्त कराये|
प्रदेश कोषाध्यक्ष संजीत पटेल ने कहा कि सूबे के नियोजित शिक्षकों ने मजदूर दिवस मनाते हुए अपने साथ हो रही हकमारी के खिलाफ संघर्षरत रहने का संकल्प लिया है| शिक्षक, सरकार के दमन से नही दबनेवाले हैं शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक प्रतिरोध जारी रखेंगे|

शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

प्रथम नागरिक का चयन - एक विमर्श

देश में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ी हुई है , हो भी क्यों नहीं आखिर हमें देश का प्रथम नागरिक का चयन जो करना है . ये कोई राज्यसभा सांसद का मनोनयन तो है नहीं कि जिसे चाहा उसे बना दिया बगैर यह सोंचे कि वह व्यक्ति वर्तमान में भी अपने पेशे में शक्रिय है और संसदीय कार्यवाही में सक्रीय भागीदारी करने कि स्थिति में नहीं है .भाई आखिर वोट का गणित भी तो देखना है . और बिना रीढ़ कि हड्डी वाले उसपर चुपचाप मोहर लगा देते हैं (संवैधानिक बंधन का तकाज़ा है ), वैसे ये दोतरफा आदान प्रदान है ,अरे भाई हम रिटायर हो रहे हैं परन्तु बच्चों को तो इसी पेशे में रहना है और प्रदेश में हीं .

आज से तीन चार दिन पहले एक राष्ट्रीय समाचार चैनल पर उत्तर प्रदेश के एक राजनेता को डॉ राजेंद्र प्रसाद से लेकर अबतक के राष्ट्रपति  को नजदीक से जानने का दावा करते और उनपर अपना मंतव्य व्यक्त करते सुना .ये तुलना वर्तमान सत्ताधारी गठबंधन के उम्मीदवार के समर्थन मे किया जा रहा था .डॉ कलाम को छोड़ कर ,जिनके नाम का प्रथम प्रस्तावक होने का उनकी पार्टी दावा करती है बांकी राष्ट्रपति तो व्यक्तित्व के मामले में वर्तमान उम्मीदवार के सामने कही नहीं टिकते .यहं तक कि अनुभव के मामले में देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद भी उनकी बराबरी नहीं कर सकते . उन महाशय का विचार सुनकर सहसा दो बातें मेरे दिमाग कि बत्ती जला गयी .पहला तो मुझे एक मुहावरा याद आया "कुँए का मेढक" .और दूसरा ये कि आजकल के इन स्वनामधन्य नेताओं मे  व्यक्तित्व और ज्ञान के मामले में स्वयं को श्रेष्ठ समझने कि कितनी बुरी बीमारी है .आश्चर्य तब और बढा जब चर्चा में शामिल राजनैतिक या पत्रकारिता से जुड़े किसी भी व्यक्ति ने आपत्ति नहीं की.शायद ..........................

एक और भी बात है इसबार के राष्ट्रपति चुनाव की जो व्यथित करती है . चुनाव मैदान में दो प्रमुख उम्मीदवार हैं .सत्तधारी गठबंधन के श्री प्रणव मुखर्जी और विपक्ष से श्री पी ए संगमा .इनमे किसी का अनुभव थोडा कम या ज्यादा हो सकता है ,मगर हैं दोनों हीं योग्य उम्मीदवार हैं . सहज सवाल है, फिर मुझे व्यथा किस बात पर हो रही है ? तो जनाब मेरा कहना है कि सर्वसहमति होना श्रेष्ठ है परंतु अगर यह न हो पाए तो चुनाव एक स्वस्थ लोकतान्त्रिक प्रक्रिया है .उम्मीदवारों और उनके समर्थकों को प्रतिद्वंदी उम्मीदवारों का सम्मान करना चाहिए . एक उम्मीदवार कि योग्यता सिद्ध करने के लिए दूसरे को छोटा करना कहाँ तक उचित है , यह समझना थोड़ा कठिन है . वैसे राष्ट्रपति चुनाव हमेशा से सत्ता और विपक्ष के शक्तिपरीक्षण का साधन रहा है और स्वस्थ लोकतंत्र में होना भी चाहिये .मगर पहली बार ऐसा लग रहा है कि ये सिर्फ राष्ट्रपति का चुनाव नहीं हो रहा , इसके बहाने निशाने कहीं और लग रहे हैं . आखिर राजनीति में सबकुछ सिर्फ स्याह या सफ़ेद नहीं होता .खैर राजनीतिक दलों को तो आगे कि राजनीति करनी है ,उम्मीदवारों से तो राजनीतिक सुचिता कि आशा कि ही जा सकती है .


राजनीति और आजादी कि दूसरी लड़ाई

कल से हीं टीम अन्ना के राजनीति मे प्रवेश पर काफी हो हल्ला मचा हुआ है .एक से बढ़कर एक प्रतिक्रियाँ देखने सुनने को मिल रही है .सभी राजनैतिक दल और उनके समर्थक या सहानुभूति रखनेवाले लोग स्वागत भी कर रहे हैं और चुनौतियों का एहसास भी करवा रहे हैं . विरोध में बोलनेवाले ज्यादातर लोग ऐसे हैं जो कह रहे हैं कि हमें तो पहले से पता था , हम तो कह हीं रहे थे कि ये राजनीति में आयेंगे . ये वो लोग हैं जो अबतक इन्हे
ं राजनीति में आने कि चुनौती देते थे .
अब इस प्रश्न का उत्तर तो भविष्य के गर्भ में है कि टीम अन्ना का ये कदम भारतीय राजनीति पर क्या प्रभाव डालेगी .
व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि ये कदम समय पूर्व लिया गया निर्णय है .मेरी सोंच पूर्णरूपेण पूर्वाग्रह रहित है . मेरा मानना है कि इस आंदोलन कि यही परिणति थी परन्तु ये अभी नहीं होना चाहिए था . मुझे इस आंदोलन को अराजनीतिक कहने पर आपत्ति रही है . इसबीच मैंने कई नेताओं और बुध्धिजिवियों को जयप्रकाश नारायण और विश्वनाथप्रताप सिंह के आंदोलन को भी अराजनीतिक कहते सुना है ,मुझे आपत्ति है .मैं शुरू से हीं इस सोंच का व्यक्ति हूँ कि कोई भी आंदोलन जो राजनीति कि दशा दिशा को प्रभावित करने कि क्षमता रखती हो या फिर मंशा रखती हो ,गैरराजनीतिक नहीं हो सकती . इस आंदोलन के प्रवर्तक इसे आज़ादी कि दूसरी लड़ाई बताते रहे हैं और ये आंदोलन इसकी क्षमता रखता था या शायद अब भी रखता हो . पर इसके लिए आंदोलन को उन प्रक्रियाओं से गुजरना होगा जिससे होकर प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन गुजरा था , बल्कि मैं कहूँगा कुछ सुधार के साथ .और पहला सुधर तो यही होना चाहिए कि चुनावी राजनीति में उतरने कि जल्दबाजी नहीं दिखानी चाहिए . आपका विचार क्या है दोस्तों .....................
 

शनिवार, 28 जुलाई 2012

पानी का बोतल , आइसक्रीम और आम आदमी की व्यथा


राजनीतज्ञों के जुमलों में एक खास प्रकार के प्राणी कि चर्चा होती है .आपको पता है वो कौन है ? अरे साहब हम में से हर किसी ने कई बार सुना होगा ,उस प्राणी को आम आदमी कहते है . कभी इसको पुचकारा जाता है ,तो कभी दुत्कारा और ललकारा जाता है .कभी इसके शारीर और आत्मा पर ढेरों घाव दिए जाते हैं, तो कभी उन्ही घावों पर मरहम लगाने का अभिनय किया जाता है . जैसा की हम सभी जानते हैं कि सामाजिक हैसियत के आधार पर समाज को तीन मुख्य वर्गों में बांटा गया है ,उच्च वर्ग ,मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग . सामाजिक वर्गीकरण में इस बेचारे प्राणी को मध्यम वर्ग भी कहते हैं . अब आप सोंचेंगे कि ठीक हीं तो है उच्च वर्ग में न सही , मध्यम वर्ग में तो है . कम से कम निम्न वर्ग में तो नहीं है ,इसमें व्यथित होने कि क्या बात है ? भाई साहब व्यथा का मूल इ़सी में तो निहित है. सच ये है कि आम आदमी को आज तक सही तरीके से परिभाषित हीं नहीं किया गया . विडम्बना ये है कि ये एकमात्र ऐसे वर्ग में रखे गए हैं जिस वर्ग के अन्दर भी वर्गीकरण है .
भारत की जनसँख्या मे उच्च वर्ग का अनुपात बमुश्किल 5% है और उन्हें किसी भी तरह के आर्थिक उठापटक ,मुद्रस्फिर्ती या महंगाई दर से सिर्फ उनकी आर्थिक हैसियत पर थोड़ा बहुत असर पड़ता है अन्यथा प्रभावहीन हीं रहता है . निम्न वर्ग या कहें “गरीबी रेखा के निचे” .सरकारी शब्दावली में असंगठित क्षेत्र के मजदूर एवं अन्य . भारत जैसे साम्यवादी,समाजवादी अवधारणा को अंगीकार करनेवाले लोकतंत्र में केंद्र या राज्य सरकारों के लगभग 80% योजनाओं का लक्षित समूह . 35 लाख का प्रशाधन कक्ष बनाने वाली सरकारी संस्था के अनुसार देश कि कुल आबादी का 35 से 40% गरीबी रेखा के निचे है यानि इस वर्ग में है . अब ये अलग एक विवाद का मुद्दा हो सकता है कि इस समूह के निर्धारण कि विधि सही है या नहीं ,योजनाओं का लाभ उन तक पहुँच पता है या नहीं, वो योजनाएं उनके वास्तविक उन्नति के लिए बनाई जाती हैं या उन्हें पराश्रित बनाने की दिशा में बढ़ाती है या उनकी निष्ठा खरीदने के लिए इत्यादि इत्यादि . पर ये तो निश्चित है कि आर्थिक विकास के साये से दूर तमाम हलचलों की मार झेलते हुए अपनी जिंदगी जीने की जद्दोजहद में लगे रहते हैं। . ये दोनों वर्ग, एक आसमान है तो दूसरा ज़मीन  परन्तु एक बात दोनों मे सामान है ,वो ये कि इन दोनों वर्गों के भीतर कोई उपवर्ग नहीं है .
आम आदमी का वर्ग “मध्यम वर्ग” . देश कि कुल जनसँख्या का 55% . सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं मे अफसर से लेकर चपरासी तक , बड़े से लेकर मझोले और छोटे किसान , एक बड़े ब्रांड कि बड़ी दुकान चलानेवाले से लेकर किराना कि छोटी दुकान चलानेवाले तक , एवं ऐसे स्वरोजगारी भी जिनके आमदनी कि निश्चितता नहीं है, ये सभी इसी वर्ग में आते हैं. अपने विस्तृत आयाम के कारण शुरू से हीं यह वर्ग दो भागों मे विभक्त था .उच्च मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग .आर्थिक उदारीकरण के दौड़ ने इसमें एक और वर्ग बना दिया ,अब उच्च और निम्न मध्यम वर्ग के बीच एक (सामान्य) मध्यम वर्ग आ गया . हमारे नीतिनियंता अब औपचारिक ,अनोपचारिक बातचित में उच्च मध्यम वर्ग ,मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग कि अवधारणा को स्वीकार करते हैं या बातचीत में इस्तेमाल करते हैं . मैं समझाता हूँ और शयद आप भी सहमत होंगे कि विगत समय में इसमें एक और श्रेणी जुड गया है ,वो है अतिनिम्न मध्यम वर्ग . वर्तमान में मध्यम वर्ग में चार श्रेणी हैं .उच्च मध्यम वर्ग ,मध्यम वर्ग , निम्न मध्यम वर्ग और अति निम्न मध्यम वर्ग . अगर इन चारो श्रेणियों को प्रतिशत में विभक्त करे तो उच्च मध्यम वर्ग 5% , मध्यम वर्ग 10% ,निम्न मध्यम वर्ग 15% , अति निम्न मध्यम वर्ग 25% है. आप सोच रहे होंगे ,ये क्या बात हुई भला अचानक मध्यम वर्ग में एक नया श्रेणी बन गया और देश कि कुल जनसँख्या का एक चौथाई भी हो गया . ना तो यह अचानक हुआ है और ना हीं यह मेरी व्यक्तिगत बौधिकता कि उपज है . इसकी पुष्टि सरकार या योजना आयोग द्वारा बनाई गयी समितियां भी करती है .तेंदुलकर समिति या अन्य समिति जो कहती हैं कि देश में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करनेवालों कि संख्या 65 से 80% के बीच है, अब गरीबी रेखा के 40% के वर्तमान संख्या के बाद कोई और नहीं हैं ये हीं निम्न और अति निम्न मध्यम वर्ग के लोग हैं . और मध्यम वर्ग के निचले पायदान पर मौजूद इन्ही दो श्रेणियों के लोग “असल आम आदमी” हैं, जिनके ऊपर हर प्रकार के आर्थिक हलचलों का सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है . “आम आदमी” तो सार्वजानिक बोलचाल में प्रयुक्त होता है ,आपस कि बातचीत मे अंग्रेजी का एक उपहासात्मक जुमला “मैंगो पीपुल” इस्तेमाल होता है .
मध्यम वर्ग के इसी वर्गीकरण और स्वयं को मध्यम वर्ग में बनाये रखने के जद्दोजहद के हीं भीतर छुपे हैं वो तत्व या कारण जिसके परिणामस्वरूप आर्थिक उदारीकरण के समर्थक पूर्व एवं शायद भावी वित्तमंत्री पानी कि बोतल या आइसक्रीम खरीदने और अनाज या सब्जी ,दूध या पेट्रोलियम के दाम बढ़ने पर हंगामा करने का ताना देते हैं .या शरद यादव जैसे समाजवादी कार या मोटरसाईकल औए कंप्यूटर इत्यादि खरीदने का उलाहना देते हैं . ये तो एक बानगी है . इन उलाहनों या कहें मजाक का आधार क्या है ? वो है समग्र मध्यम वर्ग जिसमें मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग के वो लोग भी आते हैं जिनकी सालाना आमदनी 10 लाख से लेकर 1 करोड़ तक या शायद ज्यादा भी है . अब स्वाभाविक है कि उच्च मध्यम वर्ग हर तरह के आधुनिक सुख-सुविधाओं का उपभोग आसानी से करने में सक्षम है . 4-5 कमरों के या उससे भी थोड़े बड़े हर प्रकार के सुख सुविधाओं से युक्त “अपने” घर में रह सकते हैं . और आम जिन्दगी में लगभग वो सभी सुविधाएँ जो मुख्य उच्च वर्ग के लोग इस्तेमाल करते हैं , ये भी कर सकते हैं .आर्थिक हलचल इनके निवेश योजनाओं को तो प्रभावित कर सकता है पर इनका दैनन्दिनी अप्रभावित ही रहेगा . मध्यम वर्ग कि दूसरी श्रेणी “मध्यम वर्ग” कशमकश में तो ये भी होते हैं क्योंकि इनका  निवास उच्च मध्यम वर्ग के आस पास ही रहता है .ऐसे में इन्हें उनके स्तर के साथ सामंजस्य बिठाने कि ललक भी  होती है और थोड़ी मज़बूरी भी .हाँ ये इतने सक्षम तो होते हीं हैं कि सामान्य भौतिक संसाधनों का उपभोग कर सकें. इसप्रकार मध्यम वर्ग के ये दोनों श्रेणी के लोग उन सुविधाओं का इस्तेमाल करते हैं जिनका जिक्र माननीय मंत्री या शरद यादव जी ने किया . यहाँ प्रश्न उठता है कि क्या ये 15% लोग बांकी के 40% लोगों का प्रतिनिधित्व कर सकते है .  
आपको लग रहा होगा कि मैं शहरों कि बात कर रहा हूँ . हाँ , अभी मैं शहरो कि हीं बात कर रहा हूँ क्योंकि उलाहना देनेवाले और मजाक उड़ानेवाले ऐसे बयान शहरी आम आदमी को केन्द्र मे रखकर हीं दिए गए हैं . अब जरा मध्यम वर्ग के निचली दो श्रेणियों कि अर्थव्यवस्था और जीवन स्तर की पड़ताल कर लेते हैं . इनमे निम्न मध्यम वर्ग में ज्यादातर निचले स्तर के सरकारी कर्मचारी और मध्य स्तर के बिना मलाईदार पदों पर काम करनेवाले सरकारी कर्मचारी ,निजी क्षेत्र में मध्य स्तर के ज्यादातर कर्मचारी शामिल हैं . ये ज्यादातर किराये के मकान में रहते हैं . दैनिक आवश्यकताओं कि पूर्ति करने में , बच्चों के उज्जवल भविष्य के प्रयास में उनको स्तरीय शिक्षा देने कि जद्दोजहद में लगे लोग हैं . कार्य की प्रकृति के अनुसार व्यक्तिगत वाहन ले तो ले अन्यथा सार्वजानिक यातायात के साधनों का हीं इस्तेमाल करते हैं .बच्चों के भविष्य , उनके शादी व्याह की चिंताओं में हीं इतने उलझे होते हैं की क्या विलासिता की वस्तुओं का इस्तेमाल करें . मंत्री महोदय या उन जैसी सोंच रखनेवाले लोग कहते हैं ,क्रयशक्ति बढ़ गयी है , तनख्वाह बढ़ गयी है . अरे जनाब कितनी बढ़ गयी है ? क्या आपको पता भी है कि देश के सभी शहरों मे मकान का किराया पिछले दो सालों में 20% से ज्यादा बढ़ गया है . अन्य सभी आवश्यक आवश्यकताओं कि वस्तुओं के दाम में भी 15 से 25% तक कि वृद्धि हुई है .पेट्रोलियम पदार्थों एवं अन्य संसाधनों की कीमत भी 15 से 35% तक बढ़ गए .इनके बच्चों के बेरोजगारी कि समस्याएं भी हैं. अब हमारे माननीय लोग हीं बताएं कि इनकी क्रय शक्ति बढ़ी है या घटी है ?यह वर्ग  आर्थिक हलचलों ,बढती महंगाई और बच्चों की बेरोजगारी के परिणामस्वरूप बड़ी तेजी से मध्यम वर्ग के सबसे निचले पायदान कि ओर जा रहा है .इसे लेकर ये समूह पहले हीं बहुत व्यथित है ,जो शांतिपूर्ण आंदोलनों में इनकी भागीदारी के रूप में दिखने लगी है . हमारे नीतिनियंता ऐसे बयानों के द्वारा इनके ज़ख्मों को कुरेद रहे हैं बजाय मरहम लगाने के . सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वहन हीं इन पर पहाड़ की तरह गिरता है .ये क्या पानी की बोतल खरीदकर पियेंगे या रोज आइसक्रीम खायेंगे .
अब रहा अति निम्न मध्यम वर्ग . इस वर्ग में ज्यादातर निजी क्षेत्र में निचले स्तर पर कार्य करनेवाले लोग हैं और व्यापारिक प्रतिष्ठानों में कार्य करने वाले लोग हैं . स्वरोजगारी पेशेवर लगभग मध्यम वर्ग के सभी श्रेणी में हैं ,स्वाभाविक है इसमें भी होंगे . इन लोगों की आयसीमा 1लाख से 3 लाख तक है .चकाचौंध से भरी पत्रकारिता जगत के भी प्रारंभिक स्तर के लोग इसी श्रेणी में हैं . अविकसित या अर्धविकसित आवासीय क्षेत्रों में रहने वाले इन लोगों के आमदनी का 25% तक माकन का किराया देने में खर्च होता है .फिर बच्चों की शिक्षा इनकी प्राथमिकता मे ऊपर होने के कारण बड़ा हिस्सा सामान्य स्तर की शिक्षा देने में निकल जाता है .इसके बाद बड़ी मुश्किल से तो ये अतिआवश्यक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं. सामान्य आवश्यकताओं के लिए भी व्रत या त्योहारों का इंतजार होता है और कई बार वो भी मज़बूरी बन जाती है . सरकार के बजट की तरह इनका बजट भी घाटे में हीं चलता है . इस घाटे की भरपाई विश्व बैंक की तरह बगल का किराना दुकानदार करता है और बदले में हर सामान की कीमत मे १०% तक ज्यादा बढा लेता है . एक तो इनका वेतन जल्दी बढ़ता नहीं और अगर बढ़ता है तो उतना नहीं जितना घरेलु इस्तेमाल के सामानों का दाम बढ़ जाता . इनकी व्यथा बड़ी दारुण है .सम्भव है कभी आइसक्रीम खरीद लेते हों पर वो बच्चे के लिए हीं ,बांकी का पूरा परिवार अपने बच्चे को खता देखकर हीं उसका स्वाद महसूस कर लेगा .15 रूपये में संसद के भोजनालय में विभिन्न व्यंजनों से भरा थाली खाने वालों को शायद पता भी नहीं होगा की बाहर 15 रूपये में सिर्फ 3 कुलचे और एक दोना छोला मिलता है . निम्न और अतिनिम्न वर्ग के लोग बोतल का पानी नहीं पीते ,ये घर मे सरकारी नलकों से निकलने वाला संदिग्ध गुणवत्ता का और बाहर सड़क पर मिलने वाला पानी पीते है .कभी अख़बारों में नौकरी का विज्ञापन भी देख लें शरद जी ,वहाँ लिखा होता है “वाहन एवं लैपटॉप आवश्यक” .ये चीजें शौक के लिए नहीं ख़रीदे जाते ,एक अदद नौकरी इसका कारण हैं . संस्था के सबसे निचले पायदान पर होने के कारण सामान्यतया इनकी नौकरी अस्थायी ही रहती है ,पूर्णतया नियोक्ता के रहमो करम पर .इस श्रेणी के स्वरोजगारियों कि स्थिति बेरोजगारों जैसी हीं है . फिर वैसे बेरोजगार जो कतिपय कारणों से गरीबी रेखा के निचे नहीं हैं . 
इन परिस्थितियों के आलोक में उपरोक्त बयानों के उद्देश्य , प्रभाव एवं परिणाम के बरे में सोंचे . उपरोक्त बयान किसी एक चिदंबरम या शरद यादव कि सोंच नहीं है ,ज्यादातर राजनीतक समुदाय के लोग ऐसी हीं सोंच रखते हैं . कतिपय कारणों से मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग कि जमात के बुद्धिजीवी ,पत्रकारगण एवं सामाजिक कार्यकर्त्तागन भी उनकी हाँ मे हाँ मिलाते हैं . ये पढ़े लिखे ,शिक्षित लोग हैं ,जो उंदर हीं उंदर उबल रहे हैं .इसप्रकार के बयान आग में घी डालने का काम हीं कहा जायेगा . अभी तो ये सफल राजनीतिक कुचक्रों से जाती ,सम्प्रदाय में विभाजित हैं मगर जिस दिन ये शिक्षित 40% लोग संगठित होकर सडकों पर उतर गए या विद्रोही स्वर और तेवर अपना लिया तो क्या होगा ? शांत जल के भीतर उठ रही लहरों के शोर को शायद शासक , राजनीतिक और संभ्रांत वर्ग के लोग सुन नहीं रहे या स्वीकार नहीं कर रहे . अगर ये लहरें सतह पर आ गई और इस जमात ने विद्रोह का बिगुल फूंक दिया तो बीहड़ों और जंगलों में चल रही लड़ाई से भी भयानक होगी जो सभ्य समाज कि सड़कों पर लड़ी जायेगी . इस आंदोलन को कुचलना आसान भी नहीं होगा क्योंकि सशत्र बल के अग्रिम पंक्तियों के सिपाही भी इसी वर्ग समूह से आते हैं क्या वो अपने हीं भाई बंधुओं पर आसानी से लाठी गोली चला पाएंगे . अगर आप सहमत न हों तो जरा आज के दौर में छोटे बड़े अपराधों में पकडे जाने वाले युवाओं को और उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि को देख लें . सामाजिक परिस्थितियां , प्रशासनिकतंत्र , राजनीतिक उदासीनता और अवसर का अभाव इन युवाओं को बलात् इन दिशाओं मे धकेल रहे हैं . संभव है मेरा यह आलेख बगावती श्रेणी का माना जाये परन्तु इन परिस्थियों कि जिम्मेदारी कौन लेगा ?

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बुधवार, 11 जुलाई 2012

स्वतंत्रता के पुरोधाओं कि व्यथा


एक दिन भारत के प्रथम गृहमंत्री आदरणीय वल्लभ भाई पटेल मेरे सपने में आये , बहुत दुखी लग रहे थे. मैंने सादर अभिनन्दन कर उनसे पूछा, क्या बात है? आप इतने दुखी क्यों लग रहे हैं ? मेरे इतना पूछते हीं उनके वेदना कि धारा फूट पड़ी . कहने लगे क्या बताऊँ भारत कि दुर्दशा अब देखी नहीं जा रही .क्या यही दिन देखने के लिए नरमपंथियों ,हम जैसे मध्यमार्गियों और क्रांतिवीरों ने संघर्ष किया था ?  ये हमारा आज़ादी, 1857  से लेकर 1947 तक न जाने कितने या सच कहें तो अन अनगिनत लोगों के बलिदानों का प्रतिफल था . क्या क्या सपने देखे थे हमलोगों ने स्वतंत्र भारत के स्वरुप और हमारे  लोगो के विकास को लेकर . नारद मुनि जब पृथ्वी भ्रमण से लौटकर यहाँ कि बातें बताते हैं तो कलेजा फट जाता है . हमारे नेता को तो कोई दर्द है नहीं ,वो तो यहाँ भी ............. माउन्टबेटन के पीछे घूमते थे और वहां भी समविचार वाले देवराज के साथ लगे रहते हैं .बापू तो बस बटवारे कि
की सहमति देने से भी बड़ी गलती करने के दर्द से कोमा में ही चले गए हैं . अब मेरी चौंकने कि बारी थी . मैं तपाक से पूछ बैठा ,बटवारे से भी बड़ी गलती ?
उन्होंने एक ठंढ़ी आह भरी और कहने लगे , हाँ बटवारे से भी बड़ी गलती “अपने प्रिय शिष्य की प्रियदर्शिनी को अपना उपनाम देकर” . इन दोनों गलतियों कि सजा देश आज तक भुगत रहा है . एक भारत को बाहर से अपने सैनिक और भाड़े के सिपाहियों द्वारा परेशां करता रहता है . दूसरा खानदान भारत और यहाँ की जनता के कुंडली में कालसर्पयोग कि तरह बैठ गया है और वो भी बापू के उपनाम के सहारे . अब बेचारी भारत कि जनता गाँधी और काग्रेस के एहसानो से ऐसी लदी पड़ी है कि ये जानते हुए भी कि न ये असली गाँधी हैं और न ही आज कि कांग्रेस 127 साल पुरानी वो असली कांग्रेस .फिर भी जनता मुगालते मे आकर लोकतान्त्रिक तरीके से इनलोगों के राजतान्त्रिक सत्ता पर मुहर लगा देती है और फिर अगले 5 सालों तक अपने हीं पीठपर चाबुक चलने का अधिकार इन्हें दे देती है . अब पहली गलती में तो कुछ मज़बूरी भी रही हो सकती है ,पर इस दूसरी गलती का सदमा बापू बर्दास्त नहीं कर पाए . मेरी जिज्ञासा बढ़ रही थी कि तभी वो उठकर खड़े हो गए .मैंने पूछा क्या हुआ तो कहने लगे मन बहुत भारी हो गया है ,मैं फिर आऊंगा . और तभी अलार्म कि घंटी से मेरी नींद खुल गयी . मुझे पुनः उनसे मुलाकात का इंतजार रहेगा ,और मैं हमारी बातचीत आप तक भी पहुंचाऊंगा .......................... क्रमशः

रविवार, 10 जून 2012

अपने को एक बुरी बीमारी है ...सपने देखने की...तरह-तरह के सपने आते हैं क्या करूँ? कभी कोई सपना सच नहीं होता... पर एक दिन अपुन गरीब का भी एक सपना सच हो गया ........
.....एक रात मेरे सपने में आहलुवालिया जी आये ...अरे नहीं पहचाना क्या? अ..र..रेरे अपने मोंटेकसिंह जी ...बोले यार गंजे बड़ी फद्द हो रही हैं..
मैंने पुछा- किस बारे में .....?
वे बोले ...अरे उसी गरीबी वाली बात पे..../
मैं बोला... हा यार आपने तो हद्द ही कर दी ३५ रुपये में ....
.वो बीच मैं बात काट के बोले - मत याद दिला यार...सोच कित्ता कठीन काम है गरीब देश में ज्यादा गरीब ढूँढना.....अब सब को तो गरीब कह नहीं सकते ना... वर्ना जनता पूछती ६० साल से क्या झक मार रहे थे ....... ये कुछ ऐसा हि कठीन काम है.. जैसे कि रिजेक्टेड सड़े गले आलू–प्याज में से सेलेक्टेड आलू प्याज ढूँढना ..
मैंने हस के कहा ...यनी एक तो रिजेक्टेड और उसमें भी सेलेक्टेड
वो बोले ....ओफ्फ्फ्फ़ हाँ ....यार, बहुत प्लानिंग कि सर्वे किये ...ये पता करेने, कि कोई आदमी इस गरीब देश में गरीब कब कहलाये..., यहाँ तक कि, सर्वे के लिए राहुल बाबा को भी भेजा... गरीबों के घर...पर तू तो जानता ही हैं ना, वो तो मस्त खाना-विना खाए और खाट पे लंबी तान के सो गए, ...खैर छोड क्या बोलना उनके बारे... सारा देश जानता ही है......
मैंने उनकी परेशानी भाप ..हम्म में सर हिलाया/
वो बोले - यार कोई आईडिया-वीडिया देना, कैसे प्लानिंग करूँ....वाट लगी पड़ी हैं अपुन की...
मैंने उन्हें बीच में ही टोक कहा .... और देश की भी ...
वो बोले- छोड ना देश को ....कुछ आईडिया देना...
मैंने कहा ...किस बारे में?
वे बोले –प्लानिंग के बारे में...कैसे अच्छे और सच्चे प्लान बनाये ... 
मैं बोला ..भाई में क्या आईडिया दूँ ...मैं कुछ नहीं जानता प्लानिंग्-व्लानिग के बारे में ....
मोंटेकजी चुटकी ले बोले ... क्यों बे गंजे फेस बुक पे तो बड़ी लंबी-लंबी छोड़ता हैं, अब जब मैं कुछ आइडिया मांग रहा हूँ, तो साप सूंघ गए.....
मैंने अपने गंजे सर को खुजलाया, और मन ही मन सोचा, उधर फेस-बुक पे कुछ भी फेकने में क्या जाता हैं....सिवाए इन्टरनेट के बिल के ...पर इनको को क्या बोलू ....
मैंने कहा, भाई आप अपने मनु भाई से आईडिया लो ना, बड़े वाले इकोनोमिस्ट हैं वो... वे ही कुछ बतलायेंगे../
मोंटेकजी बोले...अब क्या कहूँ? वो तो पिछले ५-६ सालों से मौन व्रत पे हैं, कुछ भी पूछो... कुछ भी करो, कुछ बोलते ही नहीं ....बड़े संत पुरुष हैं/
मैंने कहा - तो किसी और से पूछो भाई...आप के पास...दीदी है ...दादा है.. अम्मा है मेरे पास क्या है?
वो गुस्से में तम-तमा के बोले, बस बस ...इसे पूछ.. उसे पूछ... खुद कोई जोम्मेदारी ना लेना ...देश इसी लिए तो आगे नहीं आ पा रहा है , सब को अधिकार चाहिए ...कोई कर्तव्य नहीं निभाना चाहता......./
मैंने सोचा, बाबा अगर आज मैंने इनको एक आईडिया नहीं दिया, तो देश कि लाइफ चेनज होने से रह जायेगी...
मैंने किसी कुशल डाक्टर के तरह पुछा अच्छा ...आपकी प्रॉब्लम क्या है..?
वो बोले – आईडिया ही नहीं आते ..प्लानिंग क्या ख़ाक करूँ.../ 
....उनकी बात सुन, अचानक मेरे दीमाग में एक बात आई... [बॉस अपना भेजा जब कभी क्रिएटिव वे में चलता है तो सिर्फ एक ही जगह पे, वो है - टॉयलेट, हो न हो इनके टॉयलेट में हि कुछ लोचा होगा जो आईडिया नहीं आ रहे,....] सो मैंने सवाल किया -बॉस आपका टॉयलेट कैसा हैं?
वो अजीब सा मुह बना के बोले, इस से तुम्हे क्या मतलब भाई?
मैंने कहा –सिर्फ ये कहो कि टॉयलेट कैसा है? 
वो बड़े दुखी हो बोले - क्या कहूँ बहुत बुरा है..
मैं मन ही मन खुश हुआ, सोचा चलो, अब आईडिया चीटका सकता हूँ,
मैंने पुछा -क्यों ?
वे बोले ...क्या करे? जब भी नया अच्छा टॉयलेट बनाते हैं, उसमे से कोई ना कोई लोटा और बाकी सामान चुरा भाग जाता है...
मैंने आश्चर्य से उनकी ओर देख पुछा ...आपके ऑफिस..... मेरा मतलब है कि, सरकारी महकमे में भी लुटिया चोट्टे होते हैं क्या?
वो शर्मा के बोले ....बस क्या गंजे भाई... आप भी ना .....फिरकी लेते हो ... हमारे यहाँ को छोड और कहा होते?
मैंने कहा भाई आप कि प्रॉब्लम का झक्कास सोलुशन मिल गया ...
वो खुश होगये और बोले ..क्या ?
मैंने कहा बॉस आप खुद के लिए और आपके पट्ठो के लिए सुपर-डुपर टॉयलेट बना डालिए
वो तुनक के बोले ...उस से क्या होगा? ये भी भला कोई हल हुआ ?
मैंने उन्हें अपना सीक्रेटे ज्ञान झाड़ा .... कि अच्छा टॉयलेट ही, अच्छे आईडिया कि जन्म स्थली है.. 
उन्होंने संदेह जताया ....पर फिर से कोई लोटा और टॉयलेट का सामान चुरा ले गया तब ?
मैंने कहा- सी सी टीवी कैमरा लगा दो...
वो बोले -अंदर ...?
मैंने कहा- अरे नहीं भाई, दरवाजे पे, ताकि कोई लुटिया या और सामान चुराए तो पकड में आजाये/
वो बेहद खुश हो गये और गले लगा बोले... वाह क्या आईडिया हैं सरजी....
मैंने कहा भाई... ये आईडिया तो देश कि लाइफ चेनज कर दे गा ना...?
वो बोले भाई कर तो सकता है बशर्ते ये ही सरकार अगली बार बने , क्यों कि प्लानिंग करते-करते एक दो साल तो लग हि जायेंगे, और तब तक हो सकता है नई सरकार बन जाये, क्यों कि अभी के इनके कर्म देखते हुए तो ये नहीं लगता कि ये ही सरकार रहेगी... फिर नयी सरकार नयी प्लानिग...पर हाँ अगर ये ही सरकार रही तो देश कि पक्के में लाइफ चेनज ...
और बस तभी मेरी आँख खुल गई ... सामने अखबार रखा था जिस पे ...एक हेड लाइन चमक रही थी “३५ लाख का टॉयलेट ......”  विवेक ........एक फेसबुक मित्र के पोस्ट से साभार 

शनिवार, 14 अगस्त 2010

आजादी के ६३ साल

भारतीय स्वतंत्रता के ६३ वर्ष पुरे होने सभी भारतवासियों एवं भारतवंशियों को हार्दिक बधाईयाँ । आशा है आप सभी यह नहीं भूले होंगे की कितनी कठिनाईयों के पश्चात् ये आजादी हमें प्राप्त हुई थी । हमारी पीढ़ी को ये जो जन्मजात उपहार प्राप्त हुआ है , इसका सम्मान करना एवं इसे बनाये रखना हमारा पुनीत कर्तव्य है ।

मंगलवार, 3 अगस्त 2010

श्रधांजलि - एक अप्रतिम एवं सूक्ष्मदर्शी पत्रकार को

'नारद्नामा' - यह एक तुच्छ प्रयास है , जिसके द्वारा मैं एक ऐसे पत्रकार को श्रद्धांजलि देने की कोशिश कर रहा हूँ जिनके  स्तंभ को पढ़कर मैं बड़ा हुआ हूँ । इसकी प्रेरणा मुझे उन्ही के स्थायी स्तम्भ " नारद जी खबर लायें हैं " से मिली । पत्रकारिता जगत के देदीप्यमान सितारे स्वर्गीय गोपाल प्रसाद व्यास को मेरा शत-शत नमन । अपने स्तम्भ में किये गए कटाक्षों के द्वारा वो समाज को झकझोर कर रख देते थे । व्यंग के माध्यम से वे जिन मुद्दों को उठाते थे एवं जिस प्रकार प्रस्तुत करते थे , वो न सिर्फ प्रसंसनीय है अपितु अनुकरणीय है ।
अपने इस प्रयास में सफलता हेतु मैं आपसे आशीर्वाद की कामना रखता हूँ , एवं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वो मुझे इतनी क्षमता प्रदान करें की मैं अपने उद्देश्य के साथ न्याय कर सकूँ ।
पाठक बंधुओं से मेरा निवेदन है की वो त्रुटियों के प्रति मेरा ध्यान अवश्य आकर्षित करें । -सधन्यवाद