वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने,1 फरवरी 2020 को मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का दूसरा आम-बजट (2020-2021)पेश किया ,2.39 घंटा का अब तक का सबसे लम्बा बजट भाषण पढ़ा।
भारत को वैश्विक शिक्षा केन्द्र बनाने के लिए वित्त मंत्री ने शिक्षा के लिए 99.300करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है,लेकिन भारी खेद का विषय यह है क़ी अपने ढाई घंटे के लंबे भाषण के दौरान, वित्त मंत्री ने स्कूली शिक्षा का अलग से उल्लेख तक नहीं किया, इस तथ्य के बावजूद कि लाखों बच्चे अभी भी स्कूल से बाहर हैं, मौजूदा बजट न केवल शिक्षा के मौलिक अधिकार कानून 2009 के जमीनी क्रियान्वयन व विस्तार के प्रति सरकार की गैर जवाबदेही एवं ढुलमुल रवैये का परिचायक है बल्कि यह स्कूली शिक्षा में सुधार के लिए सरकार द्वारा लगातार किये जा रहे सतही दावों और गरीब आम जनता की शिक्षा के क्षेत्र में भागीदारी के प्रति उदासीन नजरिए की भी पोल खोल देता है।
सरकार पूर्व प्राथमिक से उच्चतर माध्यमिक शिक्षा (3-18 वर्ष) तक शिक्षा अधिकार कानून 2009 के विस्तार करने का इरादा रखती है, जैसा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे में सिफारिश की गई है तो उसे पर्याप्त बजट मुहैया कराना ही होगा।
अभी भी बच्चों की एक बड़ी संख्या (जनगणना 2011 के मुताबिक 8.4 करोड़ बच्चे स्कूल के बाहर है, देश भर में 10.1 लाख शिक्षकों की कमी है, तकरीबन 2 लाख सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं और विलय के नाम पर तमाम राज्यों में सरकारी स्कूलों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है. लगभग 1लाख स्कूल 1 शिक्षक के भरोसे चल रहा है।
शिक्षा अधिकार कानून, 2009 के लागू होने के तकरीबन एक दशक होने को आये हैं लेकिन सरकारी स्कूलों में से केवल 13 फीसदी में ही अभी आरटीई के प्रावधान लागू हो सके हैं. ऐसे में शिक्षा को लेकर सरकार की प्राथमिकता और कोई ठोस रोडमैप बनाने के प्रति उदासीनता सहज ही समझी जा सकती है.
बजट अभिभाषण में शिक्षा के डिजिटलाइजेशन और ऑनलाइन पाठ्यक्रम की बात कही जा रही है लेकिन हकीकत ये है कि बजट के मोर्चे पर शिक्षा के प्रति लगातार उपेक्षा दलित-वंचित, अल्पसंख्यक समेत गरीब, हाशिये के समुदायों और लड़कियों की शिक्षा पर सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव डालेगी। “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” का नारा देने वाली और 2014 में सत्ता में आने से पहले अपने घोषणा-पत्र में शिक्षा पर 6 फीसदी खर्च का वायदा करने वाली सरकार जब इस तरह के बजट की घोषणा करती है तो 2030 तक उच्चतर माध्यमिक शिक्षा (एसडीजी लक्ष्य 4) को सार्वभौमिक बनाने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता का अंदाज लगाया जा सकता है।
स्कूली शिक्षा के लिए महज 59845 करोड़ रुपये (पिछले वर्ष के 56386 करोड़ में से केवल 3459 करोड़ रुपये की न्यूनतम वृद्धि) के बल पर शिक्षा के सर्वव्यापीकरण के लक्ष्य को हासिल करना कतई असंभव है।
बिहार के सन्दर्भ में देखे तो जँहा की शिक्षा की स्थिति देश के सबसे निचले पावदान पे है ना तो मानक(RTE 30:1और 35:1)के हिसाब से शिक्षक है,और ना शिक्षको को आर्थिक निर्वाह करने के अनुरूप वेतन,या तो यहां शिक्षको को कई महीनों तक वेतन ही नही मिलता या मिलता भी है तो सरकार द्वारा निर्धारित आधा अधूरा,यधपि सरकार ने कागजो पे दक्ष शिक्षको हेतु शैक्षणिक मानक के हिसाब नियुक्त तो कर लिया गया है लेकिन नियोजन जैसे नाम के साथ, जिसमे आधी अधूरी वेतनमान(देश के बाकी राज्यो में जंहा पूर्णवेतनमान है वही बिहार के RTE अनुरूप शिक्षको का आधा अधूरा वेतनमान )दी जाती है,आंदोलनों के माध्यम से कई बार सवाल भी उठाए जाते रहे है जब काम समान तो वेतन समान क्यों नही,अर्थात समान काम का सामान वेतन शिक्षक RTE के अनुरूप तो वेतन बाकी राज्य के RTE अनुरूप दक्ष शिक्षको जैसा क्यों नही।ऐसे में कम वेतन पाने के कारण शिक्षको के ऊपर जीवकोपार्जन हेतु अर्थिक तंगी का मनोवैज्ञानिक दबाब बना रहता है,जसके कारण अपनी क्षमता का चाह कर भी भरपूर उपयोग नही कर पाते,क्योंकि अच्छे से अच्छे ईंजन में अच्छा ईंधन ना डाला जए तो उच्च किस्म का ईंजन भी अपनी क्षमता के अनुरूप कार्य नही कर पाता।
ऐसे में ज्ञान की धरती बिहार को पुनः ज्ञानिक धरा नामकरण होने की बात अब केवल दिवास्वप्न ही लगती है,और भारत के विश्व गुरु होने की बात कोरी कल्पना मात्र।
जंहा तक नई तकनीक(ऑनलाइन)
शिक्षा की बात है तो शहरी क्षेत्र के ए•सी और कॉन्वेंट के विद्यार्थियों का जो पूरी तरह से नए टेक्नोलॉजी गैजेट से लैस होते है,ऑनलाइन माध्यम से पढ़ाई पुरी होने में कोई विशेष समस्या नही दिखाई देती लेकिन
हमारे देश की बहुसंख्य जनसंख्या जो ग्रामीण क्षेत्र (खास कर बिहार ) में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करते है,असल समस्या उनके साथ होती है।
ग्रामीण स्तर के छात्र- छात्राए वो ना तो टेक्नोलॉजी से पूर्ण होते है और ना ही आर्थिक सम्पन्नता इतनीं होती है की नई टेक्नोलॉजी के लिए गैज़ट (ऑनलाइन शिक्षा के उपयोग में आने वाले स्मार्ट मोबाइल,इंटरनेट डेटा पैक,ना तकनीकी ज्ञान) को वाहन कर सके।
ऐसे में ग्रामीण स्तर के विद्यार्थियों को ऑनलाइन शिक्षा एक मिथ्या सत्य के अलावे कुछ नही लगता।
विद्यालय के स्तर पर भी देखे तो ग्रामीण विद्यालय ना तो पूरी तरह अभी डिजिटिलाइजड है औऱ ना ही विद्यालय में दक्ष शिक्षक,या तो बहाली के कारण शिक्षको की भारी कमी है या है भी तो वो तकीनीकी रूप से पूरी तरह दक्ष नही है, वहा डिज़िलाईटेशन औऱ ऑनलाइन एडुक्शन प्रोग्राम सुचारु रूप से चलने पे प्रश्न चिन्ह खड़ा हो जाता हैं! इसलिय केवल डिज़िलाईटेशन औऱ ऑनलाइन शिक्षा पर फोकस करने से काम नही चलेगा जरूरत है,अभी धीरे-धरे स्कूली शिक्षा को मैन्युअलि रूप से मजबूत करना जिससे भारत जैसे बड़े जनसंख्या वाले देश मे मानव संसाधन का भरपूर उपयोग भी हो पायेगा,तथा बेरोजगारी भी दूर होगी तब कही डिजिटिलाइज की ओर धिरे - धिरे आगे बढ़ना होगा,वरना शिक्षको के आधे अधूरे वेतनमान और सार्वजनिक शिक्षा की कमजोर बुनियाद पर घोषित डिजिटलाइजेशन और ऑनलाइन पाठ्यक्रम गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के बजाय भेदभावपूर्ण शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करेंगा*।
✍🏻....लेखक परिचय
*नीरज कुमार* मूलतः जिला सिवान बिहार के रहने वाले है,स्कूली शिक्षा धनबाद(झारखंड)से पूरी की है
टीचर्स ऑफ बिहार में ब्लॉगर है
इन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एम•ए किया है,राजनीति विज्ञान और अंतरष्ट्रीय संबन्ध से राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा NET उतीर्ण है।
इन्होंने CTET,BTET,JTET परीक्षा भी उतीर्ण की है तथा इन्हें अरविंदो सोसाइटी के तरफ से
शून्य नवाचार के लिय पुरस्कृत भी किया गया है।
वर्तमान में पटना पालीगंज में सरकारी शिक्षक के पद पर पदस्थापित हैं।


अत्यंत तार्किक विश्लेषण!
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
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