शुक्रवार, 15 मई 2020

आम-बजट (2020-2021):और उपेक्षित स्कूली शिक्षा और शिक्षक



वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने,1 फरवरी 2020 को मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का दूसरा आम-बजट (2020-2021)पेश किया ,2.39 घंटा का अब तक का सबसे लम्बा बजट भाषण पढ़ा।
भारत को वैश्विक शिक्षा केन्द्र बनाने के लिए वित्त मंत्री ने शिक्षा के लिए 99.300करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है,लेकिन भारी खेद का विषय यह है क़ी अपने ढाई घंटे के लंबे भाषण के दौरान, वित्त मंत्री ने स्कूली शिक्षा का अलग से उल्लेख तक नहीं किया, इस तथ्य के बावजूद कि लाखों बच्चे अभी भी स्कूल से बाहर हैं, मौजूदा बजट न केवल शिक्षा के मौलिक अधिकार कानून 2009 के जमीनी क्रियान्वयन व विस्तार के प्रति सरकार की गैर जवाबदेही एवं ढुलमुल रवैये का परिचायक है बल्कि यह  स्कूली शिक्षा में सुधार के लिए सरकार द्वारा लगातार किये जा रहे सतही दावों और गरीब आम जनता की शिक्षा के क्षेत्र में भागीदारी के प्रति उदासीन नजरिए की भी पोल खोल देता है।
सरकार पूर्व प्राथमिक से उच्चतर माध्यमिक शिक्षा (3-18 वर्ष) तक शिक्षा अधिकार कानून 2009 के विस्तार करने का इरादा रखती है, जैसा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे में सिफारिश की गई है तो उसे पर्याप्त बजट मुहैया कराना ही होगा।
अभी भी बच्चों की एक बड़ी संख्या (जनगणना 2011 के मुताबिक 8.4 करोड़ बच्चे स्कूल के बाहर है, देश भर में 10.1 लाख शिक्षकों की कमी है, तकरीबन 2 लाख सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं और विलय के नाम पर तमाम राज्यों में सरकारी स्कूलों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है. लगभग 1लाख स्कूल 1 शिक्षक के भरोसे चल रहा है।
शिक्षा अधिकार कानून, 2009 के लागू होने के तकरीबन एक दशक होने को आये हैं लेकिन सरकारी स्कूलों में से केवल 13 फीसदी में ही अभी आरटीई के प्रावधान लागू हो सके हैं. ऐसे में शिक्षा को लेकर सरकार की प्राथमिकता और कोई ठोस रोडमैप बनाने के प्रति उदासीनता सहज ही समझी जा सकती है.
बजट अभिभाषण में शिक्षा के डिजिटलाइजेशन और ऑनलाइन पाठ्यक्रम  की बात कही जा रही है लेकिन हकीकत ये है कि बजट के मोर्चे पर शिक्षा के प्रति लगातार उपेक्षा दलित-वंचित, अल्पसंख्यक समेत गरीब, हाशिये के समुदायों और लड़कियों की शिक्षा पर सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव डालेगी। “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” का नारा देने वाली और 2014 में सत्ता में आने से पहले अपने घोषणा-पत्र में शिक्षा पर 6 फीसदी खर्च का वायदा करने वाली सरकार जब इस तरह के बजट की घोषणा करती है तो 2030 तक उच्चतर माध्यमिक शिक्षा (एसडीजी लक्ष्य 4) को सार्वभौमिक बनाने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता का अंदाज लगाया जा सकता है।
स्कूली शिक्षा के लिए महज 59845 करोड़ रुपये (पिछले वर्ष के 56386 करोड़ में से केवल 3459 करोड़ रुपये की न्यूनतम वृद्धि) के बल पर शिक्षा के सर्वव्यापीकरण के लक्ष्य को हासिल करना कतई असंभव है।
बिहार के सन्दर्भ में देखे तो जँहा की शिक्षा की स्थिति देश के सबसे निचले पावदान पे है ना तो मानक(RTE 30:1और 35:1)के हिसाब से शिक्षक है,और ना शिक्षको को आर्थिक निर्वाह करने के अनुरूप वेतन,या तो यहां शिक्षको को कई महीनों तक वेतन ही नही मिलता या मिलता भी है तो सरकार द्वारा निर्धारित आधा अधूरा,यधपि सरकार ने कागजो पे दक्ष शिक्षको हेतु शैक्षणिक मानक के हिसाब नियुक्त तो कर लिया गया है लेकिन नियोजन जैसे नाम के साथ, जिसमे आधी अधूरी वेतनमान(देश के बाकी राज्यो में जंहा पूर्णवेतनमान है वही बिहार के RTE अनुरूप शिक्षको का आधा अधूरा वेतनमान )दी जाती है,आंदोलनों के माध्यम से कई बार सवाल भी उठाए जाते रहे है जब काम समान तो वेतन समान क्यों नही,अर्थात समान काम का सामान वेतन शिक्षक RTE के अनुरूप तो वेतन बाकी राज्य के RTE अनुरूप दक्ष शिक्षको जैसा क्यों नही।ऐसे में कम वेतन पाने के कारण शिक्षको के ऊपर जीवकोपार्जन हेतु अर्थिक तंगी का मनोवैज्ञानिक दबाब बना रहता है,जसके कारण अपनी क्षमता का चाह कर भी भरपूर उपयोग नही कर पाते,क्योंकि अच्छे से अच्छे ईंजन में अच्छा ईंधन ना डाला जए तो उच्च किस्म का ईंजन भी अपनी क्षमता के अनुरूप कार्य नही कर पाता।
ऐसे में ज्ञान की धरती बिहार को पुनः ज्ञानिक धरा नामकरण होने की बात अब केवल दिवास्वप्न ही लगती है,और भारत के विश्व गुरु होने की बात कोरी कल्पना मात्र।

जंहा तक नई तकनीक(ऑनलाइन)
शिक्षा की बात है तो शहरी क्षेत्र के ए•सी और कॉन्वेंट के विद्यार्थियों का जो पूरी तरह से नए टेक्नोलॉजी गैजेट से लैस होते है,ऑनलाइन माध्यम से पढ़ाई पुरी होने में कोई विशेष समस्या नही दिखाई देती लेकिन
हमारे देश की बहुसंख्य जनसंख्या जो ग्रामीण क्षेत्र (खास कर बिहार ) में अपनी  स्कूली शिक्षा पूरी करते है,असल समस्या उनके साथ होती है।
 ग्रामीण स्तर के छात्र- छात्राए  वो ना तो टेक्नोलॉजी से पूर्ण होते है और ना ही आर्थिक सम्पन्नता इतनीं होती है  की नई टेक्नोलॉजी के लिए गैज़ट (ऑनलाइन शिक्षा के उपयोग में आने वाले स्मार्ट मोबाइल,इंटरनेट डेटा पैक,ना तकनीकी ज्ञान) को वाहन कर सके।
ऐसे में  ग्रामीण स्तर के विद्यार्थियों को ऑनलाइन शिक्षा एक मिथ्या सत्य के अलावे कुछ नही लगता।
विद्यालय के स्तर पर भी देखे तो ग्रामीण विद्यालय ना तो पूरी तरह अभी डिजिटिलाइजड है औऱ ना ही विद्यालय में दक्ष शिक्षक,या तो बहाली के कारण शिक्षको की भारी कमी है या है भी तो वो तकीनीकी रूप से  पूरी तरह दक्ष नही है, वहा डिज़िलाईटेशन औऱ ऑनलाइन एडुक्शन प्रोग्राम सुचारु रूप से चलने पे प्रश्न चिन्ह खड़ा हो जाता हैं! इसलिय केवल डिज़िलाईटेशन औऱ ऑनलाइन शिक्षा पर फोकस करने से काम नही चलेगा जरूरत है,अभी धीरे-धरे स्कूली शिक्षा को  मैन्युअलि रूप से मजबूत करना जिससे भारत जैसे  बड़े  जनसंख्या वाले देश मे मानव संसाधन का भरपूर उपयोग भी हो पायेगा,तथा बेरोजगारी भी दूर होगी तब कही डिजिटिलाइज की ओर धिरे - धिरे आगे बढ़ना होगा,वरना शिक्षको के आधे अधूरे वेतनमान और सार्वजनिक शिक्षा की कमजोर बुनियाद पर घोषित डिजिटलाइजेशन और ऑनलाइन पाठ्यक्रम गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के बजाय भेदभावपूर्ण शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करेंगा*।


✍🏻....लेखक परिचय

*नीरज कुमार* मूलतः जिला सिवान बिहार के रहने वाले है,स्कूली शिक्षा धनबाद(झारखंड)से पूरी की है
टीचर्स ऑफ बिहार में ब्लॉगर है
इन्होंने  काशी हिंदू विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एम•ए किया है,राजनीति विज्ञान और अंतरष्ट्रीय संबन्ध से राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा NET उतीर्ण है।
इन्होंने CTET,BTET,JTET परीक्षा भी  उतीर्ण की है तथा इन्हें अरविंदो सोसाइटी के तरफ से
शून्य नवाचार के लिय पुरस्कृत भी किया गया है।
वर्तमान में पटना पालीगंज में सरकारी शिक्षक के पद  पर पदस्थापित हैं।

शनिवार, 9 मई 2020

मरूभूमि बना बिहार , संपूर्ण क्रांति आंदोलन अब संभव नहीं !

सार्वजनिक_शिक्षा_और_स्वास्थ्य के साथ सार्वजनिक परिवहन जैसी मौलिक आवश्यकता की सुविधाओं के लचर होने, रोजगार और कृषि क्षेत्र में सुविधाओं के अभाव के बावजूद देश या बिहार का नागरिक समाज या छात्र - युवा आंदोलित क्यों नहीं हो रहा ? बुद्धिजीवी वर्ग और नागरिक समाज सबके सब चुपचाप क्यों बैठे हैं ? कभी सोचा है आपने ?  आइए जरा इन तथ्यों पर गौर करें-

सपूर्ण_क्रांति_आंदोलन का प्रसार बिहार से शुरू होकर पूरे देश को प्रभावित करने में सफल हुआ। देश के तमाम राज्यों सहित केन्द्रीय सत्ता में भी परिवर्तन का कारण बना। इसी प्रकार इस आंदोलन के निहितार्थ ने भी राष्ट्रीय स्तर अपना प्रभाव छोड़ा। सभी राजनीतिक दलों ने इन इस आंदोलन के निहितार्थों से सीख लिया होगा। कांग्रेस तो खैर उस आंदोलन से प्रभावित हीं हुई थी पर निश्चित रूप से सफल हुए राजनीतिक समूहों ने भी सफलता के कारकों पर विचार किया होगा। तब से आज तक लगभग सभी ने बारी बारी से राज्यों से लेकर केन्द्र तक शासन किया है। आज भी कमोबेश पूरे भारत में संपूर्ण क्रांति की उपज हीं शासन कर रहे हैं। संपूर्ण क्रांति आंदोलन के बाद एक बहुत मजेदार तथ्य उभरकर सामने आया है वो यह कि भारत में मौजूद सभी राजनीतिक दलों के बीच लाख असहमतियों के बावजूद कुछ बातों के लिए जबरदस्त सहमति है उनमें से प्रमुख हैं , #जनता_की_निष्ठा खरीदने के लिए राजकीय कोष का दुरूपयोग करने की छूट , #अपने_सुविधाओं में मनमानी बढ़ोतरी के लिए अविश्वसनीय एकता तथा #येन_केन_प्रकारेण जनता को बांट कर सत्ता का पासिंग द बॉल का खेल खेलना। हकीकत यही है कि उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे सत्ता में हैं या विपक्ष में। सारी धींगामुश्ती सिर्फ अपने-अपने समर्थकों को अपने पाले में रखकर नागरिकों को बांटे रखने की है।

#बिहार_में_भी_सम्पूर्ण_क्रांति के छात्र और नागरिक आंदोलन की उपज , छात्रों , शिक्षित बुद्धिजीवियों और नागरिकों के एकीकृत आंदोलन की ताकत समझ गए थे। इसलिए अपनी सत्ता को बरकरार रखने के लिए पहले तो इन लोगों ने नागरिकों को खंड खंड में विभाजित किया तथा छोटे छोटे लाभ देकर नैतिक रूप से कमजोर किया। प्रतिक्रियात्मक रुप से अलग अलग ध्रुव बन गए। क्रमशः #हम_भारत_के_लोग, नागरिक से समर्थक और विरोधी बनते चले गए ।
दूसरी तरफ छात्रों को कमजोर करने के लिए शिक्षा के स्तर को गिराया गया , साथ हीं शिक्षा पद्धति को भी वस्तुनिष्ठ बनाकर विश्लेषण की पूरी क्षमता को खत्म कर दिया । शैक्षणिक संस्थानों को डिग्री बांटने और उसके बाद वोट बैंक को लुभाने वाला केन्द्र बना दिया गया। विस्तृत दृष्टि के अभाव में सामाजिक विभाजन गहरा प्रभाव इन पर भी पड़ता चला गया। इन सबके कारण छात्र अब विचार नहीं करते , बस दिए गए विचारों का प्रसार करते हैं।
#छात्रों_और_प्रबुद्ध वर्ग के लोगों और नागरिकों को लोकतांत्रिक राजनीतिक दलों और उनके द्वारा पोषित मिडिया वर्ग द्वारा #वोट_बैंक के रूप में संबोधित करके किया जाने वाला अपमान समझ में आता है भी या नहीं ? बैंक तो समझ आता है ना ? आप उनके बैंक खाते में जमा वोट हैं , तात्पर्य यह कि आप उनकी संपत्ति है , नागरिक समाज धीरे धीरे इनके जाल में उलझकर #भारतीय_संविधान_की_प्रस्तावना के पहले पंक्ति में वर्णित #हम_भारत_के_लोग नहीं रहे ।
#राजनीतिक_दलें मदारियों की तरह , जाति , धर्म , राष्ट्र , क्षेत्रिय/भाषाई अस्मिता आदि तरह तरह के मनभावन तमाशों में हमें उलझाकर , अपने समुदाय ( राजनैतिज्ञ) के लिए स्वार्थसिद्धि  का मार्ग निष्कंटक बनाने में सफल हो जाते हैं।
#नागरिक_समाज_अपने_ही_पूर्वजों द्वारा दी गई शिक्षा को भूल गए। महाराणा प्रताप, शिवाजी, बाबू कुंवर सिंह , झांसी की रानी, मंगल पांडे के साथ-साथ बहादुर शाह जफर के संघर्ष को भूल गए। चाणक्य की शिक्षाओं को भूल गए। महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, चंद्र शेखर आजाद, बल्लभ भाई पटेल और भगत सिंह के संघर्षों को भूल गए। सामाजिक उत्थान के लिए पेरियार और ज्योतिबा फूले द्वारा दी गई शिक्षाओं को भूल गए हैं तो वहीं मदन मोहन मालवीय और सैयद अहमद खान द्वारा बताए गए शिक्षा के महत्व को भी भूल गए हैं। बाबासाहेब आंबेडकर के संघर्षों को भूल गए हैं उनके द्वारा उपलब्ध कराए गए संवैधानिक अधिकारों को भूल गए हैं। डॉ राजेंद्र प्रसाद और जयप्रकाश नारायण का दृढ़ निश्चय भूल गए हैं। रामधारी सिंह दिनकर , दुष्यंत और गोपाल सिंह नेपाली के संघर्षों का आह्वान भूल गए हैं।

वक्त आ गया है कि भारत के नागरिक एक बार फिर अपने इन पूर्वजों के द्वारा दी गई शिक्षाओं को याद करें , उस पर अमल करें क्योंकि उनके द्वारा बताए गए मार्ग पर चलकर ही आप अपने समाज , राज्य और देश को सशक्त बना सकते हैं , विकसित बना सकते हैं।

अमित कुमार

गुरुवार, 7 मई 2020

क्या बन्द कर दिए जाएंगे सरकारी विद्यालय ?



नीचे👇 दिनांक 03-05-2020 को दैनिक जागरण छपा हुआ एक आलेख आप सबों के विचारार्थ प्रस्तुत है। हो सकता है कि आप में से बहुत सारे साथियों ने इसे देखा होगा पर एक बार पहले ध्यान से पढ़ लें , घेरे वाले भाग को विशेष रूप से। अब आगे जो लिखूंगा उसे पेपर कटिंग पढ़ने के बाद पढ़िएगा।

पढ़_लिया_आपने? इस आलेख को लिखा है जाने माने अर्थशास्त्री भरत झुनझुनवाला जी ने। ये महाशय सरकारों के नीतियों को प्रभावित भी करते हैं और टुकड़े टुकड़े में उसको प्रचारित कर वातावरण निर्माण भी करते हैं। पढ़ लिया आपने कि किस प्रकार ये शिक्षा के पूर्णतः निजीकरण की वकालत कर रहे हैं। अब कुछ दिन पीछे जाकर इस साल के लिए बजट प्रस्तुत करते हुए केन्द्रीय वित्त मंत्री का संसद में दिया गया बजट भाषण याद करें। स्वास्थ्य में PPP( पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) मॉडल और शिक्षा में FDI (फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट) लागू करने की घोषणा हुई थी। कोरोना काल में जब जनता जीवन के आपाधापी में उलझी है। निम्न और निम्न मध्यम वर्ग के शिक्षा के केन्द्र सरकारी विद्यालयों को समाप्त करने के विमर्श को आगे बढ़ाया जा रहा है । कुछ लोग कहेंगे कि तो क्या समस्या है ? गरीबों को को मुफ्त वाउचर देने की बात भी तो हो रही है । ये तो और अच्छी बात है कि गरीब भी प्राइवेट स्कूलों में पढ़ेंगे । ऐसे लोगों से सिर्फ एक बात पूछना चाहता हूं कि वो जरा पता करके बताएं कि RTE(शिक्षाका अधिकार अधिनियम) के तहत जो निर्धन बच्चों को 25% सीट प्राइवेट स्कूलों में देने की बात कही गई है, वो कहां - कहां मिल रहा है ? एक तो ये मुफ्त वाउचर भी कितना मिलेगा? और अगर मिलेगा भी तो डाईरेक्ट बेनिफिट के अन्य राशियों की तरह इसका कितना सदुपयोग होगा? यह विचारणीय है।
श्रीमान झुनझुनवाला जी की यह सोच उनकी और उन नीतियों की एक झलक भर है जिनका वो प्रतिनिधित्व करते हैं। वो सरकारी विद्यालयों को समाप्त कर नीति विद्यालयों में शिक्षा को इसलिए बढ़ाना चाहते हैं कि सेवा क्षेत्र को उपयोगी कर्मी मिल सकें। इस बात का दूसरा अर्थ यह भी निकलता है कि उनके अनुसार अर्थव्यवस्था के प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूर वर्ग के लोगों को शिक्षा की आवश्यकता नहीं है। नीतियां यह संकेत दे रही हैं कि अर्थव्यवस्था आधार स्तंभ कामगार अब मूलतः दो भागों में विभक्त हो रहे हैं । पहला मजदूर (अकुशल श्रमिक ) और दूसरे सेवा क्षेत्र के कामगार ( कुशल श्रमिक)। सेवा क्षेत्र का मतलब है बाबू , प्रतिनिधि ।बस इनकी हीं आवश्यकता है खुली अर्थव्यवस्था के दौर में आधुनिक राजाओं रजवाड़ों (जिसमें राजनीतिक वर्ग से लेकर औधोगिक घराने तक शामिल हैं) को । श्री झुनझुनवाला बस उसी विचार को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं जिसकी खुली घोषणा माननीय प्रधानमंत्री जी ने इस बार चुनाव जीतने के बाद संसद के सेंट्रल हॉल में दिए गए पहले भाषण में की थी कि अब भारत में दो हीं वर्ग या दो हीं जाति रहेंगे , एक रोजगार पाने वाला और दूसरा रोजगार देने वाले।
यह बिहार के एक सरकारी विद्यालय की हीं तस्वीर है।

बुद्धिजीवी वर्ग, नागरिक समाज और हमारे शिक्षक भी शायद भविष्य की भयावहता का आकलन नहीं कर रहे हैं। देश सचमुच बदल रहा है। यहां अब नागरिक के लिए कोई जगह नहीं बची रही है। रहेगी तो बस नौकर और मालिक की व्यवस्था। अब इस व्यवस्था के मौलिक तत्वों को आप बेहतर समझ सकते हैं। अब सार्वजनिक शिक्षा के केन्द्र सरकारी विद्यालयों को बचाना है या नहीं ?  निर्णय आपको करना है ।

शनिवार, 2 मई 2020

शिक्षक, मजदूर शहीदों एवं कोरोना के विरुद्ध योद्धाओं को हड़ताली शिक्षकों ने दी श्रृद्धांजलि


▪ हड़ताली शिक्षकों ने मनाया मजदूर दिवस
▪ शिक्षक एवं मजदूर आंदोलनों के शहीदों की दी श्रधांजली
▪ हकमारी के खिलाफ संघर्ष का लिया संकल्प
▪ सहायक शिक्षक- राज्यकर्मी का दर्जा व पूर्ण वेतन एवं सेवाशर्त को लेकर ढ़ाई महीने से हड़ताल पर हैं शिक्षक
▪ गांव- गांव में क्वारेंटाइन सेंटर नियोजित शिक्षकों के बगैर चलाना असंभव
▪ हड़ताल पर जारी गतिरोध को सकारात्मक पहल के जरिये सुलझा सकती सरकार
▪ दमन के खिलाफ शिक्षकों में सुलग रहा आक्रोश
▪ भेदभावपूर्ण नीतियों के खिलाफ गांव गांव में होगा पोल खोल

पटना/ 01 मई+02 मई 2020/ हड़ताल पर सरकार की बेरुखी और दमनात्मक रवैये के खिलाफ सूबे के टीइटी एसटीइटी शिक्षकों ने अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के मौके पर
संघर्ष मजबूत करने का संकल्प लिया| इस दौरान नियोजित शिक्षकों ने लॉकडाउन का पालन करते हुए अपने अपने घरों में दीप प्रज्वलित कर शिक्षक एवं मजदूर आंदोलनों के शहीदों को श्रधांजली दी| शिक्षकों ने हड़ताल व अपने मुद्दे के समर्थन में सोशल मीडिया पर हैशटैग लगाकर अपने गतिविधियों की तस्वीरें भी शेयर की है| गौरतलब है कि सहायक शिक्षक- राज्यकर्मी का दर्जा व पूर्ण वेतन एवं सेवाशर्त को लेकर ढ़ाई महीने से सूबे के चार लाख नियोजित शिक्षक हड़ताल पर हैं| राज्य सरकार हड़ताल के मसले पर शिक्षक प्रतिनिधियों से वार्ता करने के बजाय दमनात्मक पत्र निकालकर आंदोलन को दबाने की रणनीति पर चल रही है| सहायक शिक्षक- राज्यकर्मी का दर्जा, पूर्ण वेतन व सेवाशर्त एवं कारवाई वापसी और सामंजन जैसे महत्वपूर्ण मसले पर बात करने के बजाय सरकार नियोजित शिक्षकों को डंडों से हांकना चाह रही है| हड़ताल के दौरान पैंसठ नियोजित शिक्षकों की मौत हो चुकी है जबकि पचीस हजार से भी अधिक शिक्षक निलंबन बर्खास्तगी व प्राथमिकी की कारवाई झेल रहे हैं| प्रवासी मजदूरों की वापसी के संकेतों ने सरकार के लिए गांव गांव में क्वारेंटाईन सेंटर की अपरिहार्यता तय की है लिहाजा उन केंद्रों पर बड़े पैमाने पर कर्मियों की जरूरत है| गांव- गांव में क्वारेंटाइन सेंटर नियोजित शिक्षकों के बगैर चलाना असंभव दिख रहा है| सरकार शिक्षक प्रतिनिधियों से बात करके हड़ताल को समाप्त कराने को लेकर गंभीर नही दिख रही है| नियोजित शिक्षक भी वार्ता के बगैर हड़ताल में बने रहने को बाध्य हैं|
समन्वय समिति कोरटीम के सदस्य और टीइटी एसटीइटी उत्तीर्ण नियोजित शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष मार्कंडेय पाठक ने बताया कि शिक्षक दमन से डरकर भागनेवाले नही हैं | दमन और बेरुखी के खिलाफ नियोजित शिक्षकों के भीतर आक्रोश सुलग रहा है| हड़ताल पर जारी गतिरोध को सरकार सकारात्मक पहल के जरिये सुलझा सकती है| लेकिन विभागीय आलाअधिकारियों के मंसूबे शिक्षकों के संघर्षों को ऐन केन प्रकारेण दबाने का ही दिखता है| भेदभाव के खिलाफ लड़ रहे शिक्षकों के साथ सरकार की चरम संवेदनहीनता के खिलाफ शिक्षक भी चुप नही बैठनेवाले हैं| शिक्षक , गांव - गांव में शासन प्रशासन व नीतियों के मोर्चे पर सरकार की विफलता का पोल खोलने की तैयारी कर रहे हैं|
प्रदेश सचिव अमित कुमार शाकिर इमाम नाजिर हुसैन और प्रदेश प्रवक्ता अश्विनी पांडेय ने कहा कि कोरोना महामारी के खिलाफ मुकम्मल मुहिम नियोजित शिक्षकों की भागीदारी के बगैर चलाना असंभव है| सरकार हठधर्मिता छोड़े- शिक्षक प्रतिनिधियों से सहायक शिक्षक- राज्यकर्मी का दर्जा, पूर्ण वेतन व सेवाशर्त एवं कारवाई वापसी और सामंजन जैसे महत्वपूर्ण मसले पर सकारात्मक बातचीत आगे बढ़ाते हुए हड़ताल समाप्त कराये|
प्रदेश कोषाध्यक्ष संजीत पटेल ने कहा कि सूबे के नियोजित शिक्षकों ने मजदूर दिवस मनाते हुए अपने साथ हो रही हकमारी के खिलाफ संघर्षरत रहने का संकल्प लिया है| शिक्षक, सरकार के दमन से नही दबनेवाले हैं शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक प्रतिरोध जारी रखेंगे|