देश में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ी हुई है , हो भी क्यों नहीं आखिर हमें देश का प्रथम नागरिक का चयन जो करना है . ये कोई राज्यसभा सांसद का मनोनयन तो है नहीं कि जिसे चाहा उसे बना दिया बगैर यह सोंचे कि वह व्यक्ति वर्तमान में भी अपने पेशे में शक्रिय है और संसदीय कार्यवाही में सक्रीय भागीदारी करने कि स्थिति में नहीं है .भाई आखिर वोट का गणित भी तो देखना है . और बिना रीढ़ कि हड्डी वाले उसपर चुपचाप मोहर लगा देते हैं (संवैधानिक बंधन का तकाज़ा है ), वैसे ये दोतरफा आदान प्रदान है ,अरे भाई हम रिटायर हो रहे हैं परन्तु बच्चों को तो इसी पेशे में रहना है और प्रदेश में हीं .
आज से तीन चार दिन पहले एक राष्ट्रीय समाचार चैनल पर उत्तर प्रदेश के एक राजनेता को डॉ राजेंद्र प्रसाद से लेकर अबतक के राष्ट्रपति को नजदीक से जानने का दावा करते और उनपर अपना मंतव्य व्यक्त करते सुना .ये तुलना वर्तमान सत्ताधारी गठबंधन के उम्मीदवार के समर्थन मे किया जा रहा था .डॉ कलाम को छोड़ कर ,जिनके नाम का प्रथम प्रस्तावक होने का उनकी पार्टी दावा करती है बांकी राष्ट्रपति तो व्यक्तित्व के मामले में वर्तमान उम्मीदवार के सामने कही नहीं टिकते .यहं तक कि अनुभव के मामले में देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद भी उनकी बराबरी नहीं कर सकते . उन महाशय का विचार सुनकर सहसा दो बातें मेरे दिमाग कि बत्ती जला गयी .पहला तो मुझे एक मुहावरा याद आया "कुँए का मेढक" .और दूसरा ये कि आजकल के इन स्वनामधन्य नेताओं मे व्यक्तित्व और ज्ञान के मामले में स्वयं को श्रेष्ठ समझने कि कितनी बुरी बीमारी है .आश्चर्य तब और बढा जब चर्चा में शामिल राजनैतिक या पत्रकारिता से जुड़े किसी भी व्यक्ति ने आपत्ति नहीं की.शायद ..........................
एक और भी बात है इसबार के राष्ट्रपति चुनाव की जो व्यथित करती है . चुनाव मैदान में दो प्रमुख उम्मीदवार हैं .सत्तधारी गठबंधन के श्री प्रणव मुखर्जी और विपक्ष से श्री पी ए संगमा .इनमे किसी का अनुभव थोडा कम या ज्यादा हो सकता है ,मगर हैं दोनों हीं योग्य उम्मीदवार हैं . सहज सवाल है, फिर मुझे व्यथा किस बात पर हो रही है ? तो जनाब मेरा कहना है कि सर्वसहमति होना श्रेष्ठ है परंतु अगर यह न हो पाए तो चुनाव एक स्वस्थ लोकतान्त्रिक प्रक्रिया है .उम्मीदवारों और उनके समर्थकों को प्रतिद्वंदी उम्मीदवारों का सम्मान करना चाहिए . एक उम्मीदवार कि योग्यता सिद्ध करने के लिए दूसरे को छोटा करना कहाँ तक उचित है , यह समझना थोड़ा कठिन है . वैसे राष्ट्रपति चुनाव हमेशा से सत्ता और विपक्ष के शक्तिपरीक्षण का साधन रहा है और स्वस्थ लोकतंत्र में होना भी चाहिये .मगर पहली बार ऐसा लग रहा है कि ये सिर्फ राष्ट्रपति का चुनाव नहीं हो रहा , इसके बहाने निशाने कहीं और लग रहे हैं . आखिर राजनीति में सबकुछ सिर्फ स्याह या सफ़ेद नहीं होता .खैर राजनीतिक दलों को तो आगे कि राजनीति करनी है ,उम्मीदवारों से तो राजनीतिक सुचिता कि आशा कि ही जा सकती है .
आज से तीन चार दिन पहले एक राष्ट्रीय समाचार चैनल पर उत्तर प्रदेश के एक राजनेता को डॉ राजेंद्र प्रसाद से लेकर अबतक के राष्ट्रपति को नजदीक से जानने का दावा करते और उनपर अपना मंतव्य व्यक्त करते सुना .ये तुलना वर्तमान सत्ताधारी गठबंधन के उम्मीदवार के समर्थन मे किया जा रहा था .डॉ कलाम को छोड़ कर ,जिनके नाम का प्रथम प्रस्तावक होने का उनकी पार्टी दावा करती है बांकी राष्ट्रपति तो व्यक्तित्व के मामले में वर्तमान उम्मीदवार के सामने कही नहीं टिकते .यहं तक कि अनुभव के मामले में देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद भी उनकी बराबरी नहीं कर सकते . उन महाशय का विचार सुनकर सहसा दो बातें मेरे दिमाग कि बत्ती जला गयी .पहला तो मुझे एक मुहावरा याद आया "कुँए का मेढक" .और दूसरा ये कि आजकल के इन स्वनामधन्य नेताओं मे व्यक्तित्व और ज्ञान के मामले में स्वयं को श्रेष्ठ समझने कि कितनी बुरी बीमारी है .आश्चर्य तब और बढा जब चर्चा में शामिल राजनैतिक या पत्रकारिता से जुड़े किसी भी व्यक्ति ने आपत्ति नहीं की.शायद ..........................
एक और भी बात है इसबार के राष्ट्रपति चुनाव की जो व्यथित करती है . चुनाव मैदान में दो प्रमुख उम्मीदवार हैं .सत्तधारी गठबंधन के श्री प्रणव मुखर्जी और विपक्ष से श्री पी ए संगमा .इनमे किसी का अनुभव थोडा कम या ज्यादा हो सकता है ,मगर हैं दोनों हीं योग्य उम्मीदवार हैं . सहज सवाल है, फिर मुझे व्यथा किस बात पर हो रही है ? तो जनाब मेरा कहना है कि सर्वसहमति होना श्रेष्ठ है परंतु अगर यह न हो पाए तो चुनाव एक स्वस्थ लोकतान्त्रिक प्रक्रिया है .उम्मीदवारों और उनके समर्थकों को प्रतिद्वंदी उम्मीदवारों का सम्मान करना चाहिए . एक उम्मीदवार कि योग्यता सिद्ध करने के लिए दूसरे को छोटा करना कहाँ तक उचित है , यह समझना थोड़ा कठिन है . वैसे राष्ट्रपति चुनाव हमेशा से सत्ता और विपक्ष के शक्तिपरीक्षण का साधन रहा है और स्वस्थ लोकतंत्र में होना भी चाहिये .मगर पहली बार ऐसा लग रहा है कि ये सिर्फ राष्ट्रपति का चुनाव नहीं हो रहा , इसके बहाने निशाने कहीं और लग रहे हैं . आखिर राजनीति में सबकुछ सिर्फ स्याह या सफ़ेद नहीं होता .खैर राजनीतिक दलों को तो आगे कि राजनीति करनी है ,उम्मीदवारों से तो राजनीतिक सुचिता कि आशा कि ही जा सकती है .
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