गुरुवार, 7 मई 2020

क्या बन्द कर दिए जाएंगे सरकारी विद्यालय ?



नीचे👇 दिनांक 03-05-2020 को दैनिक जागरण छपा हुआ एक आलेख आप सबों के विचारार्थ प्रस्तुत है। हो सकता है कि आप में से बहुत सारे साथियों ने इसे देखा होगा पर एक बार पहले ध्यान से पढ़ लें , घेरे वाले भाग को विशेष रूप से। अब आगे जो लिखूंगा उसे पेपर कटिंग पढ़ने के बाद पढ़िएगा।

पढ़_लिया_आपने? इस आलेख को लिखा है जाने माने अर्थशास्त्री भरत झुनझुनवाला जी ने। ये महाशय सरकारों के नीतियों को प्रभावित भी करते हैं और टुकड़े टुकड़े में उसको प्रचारित कर वातावरण निर्माण भी करते हैं। पढ़ लिया आपने कि किस प्रकार ये शिक्षा के पूर्णतः निजीकरण की वकालत कर रहे हैं। अब कुछ दिन पीछे जाकर इस साल के लिए बजट प्रस्तुत करते हुए केन्द्रीय वित्त मंत्री का संसद में दिया गया बजट भाषण याद करें। स्वास्थ्य में PPP( पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) मॉडल और शिक्षा में FDI (फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट) लागू करने की घोषणा हुई थी। कोरोना काल में जब जनता जीवन के आपाधापी में उलझी है। निम्न और निम्न मध्यम वर्ग के शिक्षा के केन्द्र सरकारी विद्यालयों को समाप्त करने के विमर्श को आगे बढ़ाया जा रहा है । कुछ लोग कहेंगे कि तो क्या समस्या है ? गरीबों को को मुफ्त वाउचर देने की बात भी तो हो रही है । ये तो और अच्छी बात है कि गरीब भी प्राइवेट स्कूलों में पढ़ेंगे । ऐसे लोगों से सिर्फ एक बात पूछना चाहता हूं कि वो जरा पता करके बताएं कि RTE(शिक्षाका अधिकार अधिनियम) के तहत जो निर्धन बच्चों को 25% सीट प्राइवेट स्कूलों में देने की बात कही गई है, वो कहां - कहां मिल रहा है ? एक तो ये मुफ्त वाउचर भी कितना मिलेगा? और अगर मिलेगा भी तो डाईरेक्ट बेनिफिट के अन्य राशियों की तरह इसका कितना सदुपयोग होगा? यह विचारणीय है।
श्रीमान झुनझुनवाला जी की यह सोच उनकी और उन नीतियों की एक झलक भर है जिनका वो प्रतिनिधित्व करते हैं। वो सरकारी विद्यालयों को समाप्त कर नीति विद्यालयों में शिक्षा को इसलिए बढ़ाना चाहते हैं कि सेवा क्षेत्र को उपयोगी कर्मी मिल सकें। इस बात का दूसरा अर्थ यह भी निकलता है कि उनके अनुसार अर्थव्यवस्था के प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूर वर्ग के लोगों को शिक्षा की आवश्यकता नहीं है। नीतियां यह संकेत दे रही हैं कि अर्थव्यवस्था आधार स्तंभ कामगार अब मूलतः दो भागों में विभक्त हो रहे हैं । पहला मजदूर (अकुशल श्रमिक ) और दूसरे सेवा क्षेत्र के कामगार ( कुशल श्रमिक)। सेवा क्षेत्र का मतलब है बाबू , प्रतिनिधि ।बस इनकी हीं आवश्यकता है खुली अर्थव्यवस्था के दौर में आधुनिक राजाओं रजवाड़ों (जिसमें राजनीतिक वर्ग से लेकर औधोगिक घराने तक शामिल हैं) को । श्री झुनझुनवाला बस उसी विचार को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं जिसकी खुली घोषणा माननीय प्रधानमंत्री जी ने इस बार चुनाव जीतने के बाद संसद के सेंट्रल हॉल में दिए गए पहले भाषण में की थी कि अब भारत में दो हीं वर्ग या दो हीं जाति रहेंगे , एक रोजगार पाने वाला और दूसरा रोजगार देने वाले।
यह बिहार के एक सरकारी विद्यालय की हीं तस्वीर है।

बुद्धिजीवी वर्ग, नागरिक समाज और हमारे शिक्षक भी शायद भविष्य की भयावहता का आकलन नहीं कर रहे हैं। देश सचमुच बदल रहा है। यहां अब नागरिक के लिए कोई जगह नहीं बची रही है। रहेगी तो बस नौकर और मालिक की व्यवस्था। अब इस व्यवस्था के मौलिक तत्वों को आप बेहतर समझ सकते हैं। अब सार्वजनिक शिक्षा के केन्द्र सरकारी विद्यालयों को बचाना है या नहीं ?  निर्णय आपको करना है ।

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