शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

प्रथम नागरिक का चयन - एक विमर्श

देश में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ी हुई है , हो भी क्यों नहीं आखिर हमें देश का प्रथम नागरिक का चयन जो करना है . ये कोई राज्यसभा सांसद का मनोनयन तो है नहीं कि जिसे चाहा उसे बना दिया बगैर यह सोंचे कि वह व्यक्ति वर्तमान में भी अपने पेशे में शक्रिय है और संसदीय कार्यवाही में सक्रीय भागीदारी करने कि स्थिति में नहीं है .भाई आखिर वोट का गणित भी तो देखना है . और बिना रीढ़ कि हड्डी वाले उसपर चुपचाप मोहर लगा देते हैं (संवैधानिक बंधन का तकाज़ा है ), वैसे ये दोतरफा आदान प्रदान है ,अरे भाई हम रिटायर हो रहे हैं परन्तु बच्चों को तो इसी पेशे में रहना है और प्रदेश में हीं .

आज से तीन चार दिन पहले एक राष्ट्रीय समाचार चैनल पर उत्तर प्रदेश के एक राजनेता को डॉ राजेंद्र प्रसाद से लेकर अबतक के राष्ट्रपति  को नजदीक से जानने का दावा करते और उनपर अपना मंतव्य व्यक्त करते सुना .ये तुलना वर्तमान सत्ताधारी गठबंधन के उम्मीदवार के समर्थन मे किया जा रहा था .डॉ कलाम को छोड़ कर ,जिनके नाम का प्रथम प्रस्तावक होने का उनकी पार्टी दावा करती है बांकी राष्ट्रपति तो व्यक्तित्व के मामले में वर्तमान उम्मीदवार के सामने कही नहीं टिकते .यहं तक कि अनुभव के मामले में देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद भी उनकी बराबरी नहीं कर सकते . उन महाशय का विचार सुनकर सहसा दो बातें मेरे दिमाग कि बत्ती जला गयी .पहला तो मुझे एक मुहावरा याद आया "कुँए का मेढक" .और दूसरा ये कि आजकल के इन स्वनामधन्य नेताओं मे  व्यक्तित्व और ज्ञान के मामले में स्वयं को श्रेष्ठ समझने कि कितनी बुरी बीमारी है .आश्चर्य तब और बढा जब चर्चा में शामिल राजनैतिक या पत्रकारिता से जुड़े किसी भी व्यक्ति ने आपत्ति नहीं की.शायद ..........................

एक और भी बात है इसबार के राष्ट्रपति चुनाव की जो व्यथित करती है . चुनाव मैदान में दो प्रमुख उम्मीदवार हैं .सत्तधारी गठबंधन के श्री प्रणव मुखर्जी और विपक्ष से श्री पी ए संगमा .इनमे किसी का अनुभव थोडा कम या ज्यादा हो सकता है ,मगर हैं दोनों हीं योग्य उम्मीदवार हैं . सहज सवाल है, फिर मुझे व्यथा किस बात पर हो रही है ? तो जनाब मेरा कहना है कि सर्वसहमति होना श्रेष्ठ है परंतु अगर यह न हो पाए तो चुनाव एक स्वस्थ लोकतान्त्रिक प्रक्रिया है .उम्मीदवारों और उनके समर्थकों को प्रतिद्वंदी उम्मीदवारों का सम्मान करना चाहिए . एक उम्मीदवार कि योग्यता सिद्ध करने के लिए दूसरे को छोटा करना कहाँ तक उचित है , यह समझना थोड़ा कठिन है . वैसे राष्ट्रपति चुनाव हमेशा से सत्ता और विपक्ष के शक्तिपरीक्षण का साधन रहा है और स्वस्थ लोकतंत्र में होना भी चाहिये .मगर पहली बार ऐसा लग रहा है कि ये सिर्फ राष्ट्रपति का चुनाव नहीं हो रहा , इसके बहाने निशाने कहीं और लग रहे हैं . आखिर राजनीति में सबकुछ सिर्फ स्याह या सफ़ेद नहीं होता .खैर राजनीतिक दलों को तो आगे कि राजनीति करनी है ,उम्मीदवारों से तो राजनीतिक सुचिता कि आशा कि ही जा सकती है .


राजनीति और आजादी कि दूसरी लड़ाई

कल से हीं टीम अन्ना के राजनीति मे प्रवेश पर काफी हो हल्ला मचा हुआ है .एक से बढ़कर एक प्रतिक्रियाँ देखने सुनने को मिल रही है .सभी राजनैतिक दल और उनके समर्थक या सहानुभूति रखनेवाले लोग स्वागत भी कर रहे हैं और चुनौतियों का एहसास भी करवा रहे हैं . विरोध में बोलनेवाले ज्यादातर लोग ऐसे हैं जो कह रहे हैं कि हमें तो पहले से पता था , हम तो कह हीं रहे थे कि ये राजनीति में आयेंगे . ये वो लोग हैं जो अबतक इन्हे
ं राजनीति में आने कि चुनौती देते थे .
अब इस प्रश्न का उत्तर तो भविष्य के गर्भ में है कि टीम अन्ना का ये कदम भारतीय राजनीति पर क्या प्रभाव डालेगी .
व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि ये कदम समय पूर्व लिया गया निर्णय है .मेरी सोंच पूर्णरूपेण पूर्वाग्रह रहित है . मेरा मानना है कि इस आंदोलन कि यही परिणति थी परन्तु ये अभी नहीं होना चाहिए था . मुझे इस आंदोलन को अराजनीतिक कहने पर आपत्ति रही है . इसबीच मैंने कई नेताओं और बुध्धिजिवियों को जयप्रकाश नारायण और विश्वनाथप्रताप सिंह के आंदोलन को भी अराजनीतिक कहते सुना है ,मुझे आपत्ति है .मैं शुरू से हीं इस सोंच का व्यक्ति हूँ कि कोई भी आंदोलन जो राजनीति कि दशा दिशा को प्रभावित करने कि क्षमता रखती हो या फिर मंशा रखती हो ,गैरराजनीतिक नहीं हो सकती . इस आंदोलन के प्रवर्तक इसे आज़ादी कि दूसरी लड़ाई बताते रहे हैं और ये आंदोलन इसकी क्षमता रखता था या शायद अब भी रखता हो . पर इसके लिए आंदोलन को उन प्रक्रियाओं से गुजरना होगा जिससे होकर प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन गुजरा था , बल्कि मैं कहूँगा कुछ सुधार के साथ .और पहला सुधर तो यही होना चाहिए कि चुनावी राजनीति में उतरने कि जल्दबाजी नहीं दिखानी चाहिए . आपका विचार क्या है दोस्तों .....................
 

शनिवार, 28 जुलाई 2012

पानी का बोतल , आइसक्रीम और आम आदमी की व्यथा


राजनीतज्ञों के जुमलों में एक खास प्रकार के प्राणी कि चर्चा होती है .आपको पता है वो कौन है ? अरे साहब हम में से हर किसी ने कई बार सुना होगा ,उस प्राणी को आम आदमी कहते है . कभी इसको पुचकारा जाता है ,तो कभी दुत्कारा और ललकारा जाता है .कभी इसके शारीर और आत्मा पर ढेरों घाव दिए जाते हैं, तो कभी उन्ही घावों पर मरहम लगाने का अभिनय किया जाता है . जैसा की हम सभी जानते हैं कि सामाजिक हैसियत के आधार पर समाज को तीन मुख्य वर्गों में बांटा गया है ,उच्च वर्ग ,मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग . सामाजिक वर्गीकरण में इस बेचारे प्राणी को मध्यम वर्ग भी कहते हैं . अब आप सोंचेंगे कि ठीक हीं तो है उच्च वर्ग में न सही , मध्यम वर्ग में तो है . कम से कम निम्न वर्ग में तो नहीं है ,इसमें व्यथित होने कि क्या बात है ? भाई साहब व्यथा का मूल इ़सी में तो निहित है. सच ये है कि आम आदमी को आज तक सही तरीके से परिभाषित हीं नहीं किया गया . विडम्बना ये है कि ये एकमात्र ऐसे वर्ग में रखे गए हैं जिस वर्ग के अन्दर भी वर्गीकरण है .
भारत की जनसँख्या मे उच्च वर्ग का अनुपात बमुश्किल 5% है और उन्हें किसी भी तरह के आर्थिक उठापटक ,मुद्रस्फिर्ती या महंगाई दर से सिर्फ उनकी आर्थिक हैसियत पर थोड़ा बहुत असर पड़ता है अन्यथा प्रभावहीन हीं रहता है . निम्न वर्ग या कहें “गरीबी रेखा के निचे” .सरकारी शब्दावली में असंगठित क्षेत्र के मजदूर एवं अन्य . भारत जैसे साम्यवादी,समाजवादी अवधारणा को अंगीकार करनेवाले लोकतंत्र में केंद्र या राज्य सरकारों के लगभग 80% योजनाओं का लक्षित समूह . 35 लाख का प्रशाधन कक्ष बनाने वाली सरकारी संस्था के अनुसार देश कि कुल आबादी का 35 से 40% गरीबी रेखा के निचे है यानि इस वर्ग में है . अब ये अलग एक विवाद का मुद्दा हो सकता है कि इस समूह के निर्धारण कि विधि सही है या नहीं ,योजनाओं का लाभ उन तक पहुँच पता है या नहीं, वो योजनाएं उनके वास्तविक उन्नति के लिए बनाई जाती हैं या उन्हें पराश्रित बनाने की दिशा में बढ़ाती है या उनकी निष्ठा खरीदने के लिए इत्यादि इत्यादि . पर ये तो निश्चित है कि आर्थिक विकास के साये से दूर तमाम हलचलों की मार झेलते हुए अपनी जिंदगी जीने की जद्दोजहद में लगे रहते हैं। . ये दोनों वर्ग, एक आसमान है तो दूसरा ज़मीन  परन्तु एक बात दोनों मे सामान है ,वो ये कि इन दोनों वर्गों के भीतर कोई उपवर्ग नहीं है .
आम आदमी का वर्ग “मध्यम वर्ग” . देश कि कुल जनसँख्या का 55% . सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं मे अफसर से लेकर चपरासी तक , बड़े से लेकर मझोले और छोटे किसान , एक बड़े ब्रांड कि बड़ी दुकान चलानेवाले से लेकर किराना कि छोटी दुकान चलानेवाले तक , एवं ऐसे स्वरोजगारी भी जिनके आमदनी कि निश्चितता नहीं है, ये सभी इसी वर्ग में आते हैं. अपने विस्तृत आयाम के कारण शुरू से हीं यह वर्ग दो भागों मे विभक्त था .उच्च मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग .आर्थिक उदारीकरण के दौड़ ने इसमें एक और वर्ग बना दिया ,अब उच्च और निम्न मध्यम वर्ग के बीच एक (सामान्य) मध्यम वर्ग आ गया . हमारे नीतिनियंता अब औपचारिक ,अनोपचारिक बातचित में उच्च मध्यम वर्ग ,मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग कि अवधारणा को स्वीकार करते हैं या बातचीत में इस्तेमाल करते हैं . मैं समझाता हूँ और शयद आप भी सहमत होंगे कि विगत समय में इसमें एक और श्रेणी जुड गया है ,वो है अतिनिम्न मध्यम वर्ग . वर्तमान में मध्यम वर्ग में चार श्रेणी हैं .उच्च मध्यम वर्ग ,मध्यम वर्ग , निम्न मध्यम वर्ग और अति निम्न मध्यम वर्ग . अगर इन चारो श्रेणियों को प्रतिशत में विभक्त करे तो उच्च मध्यम वर्ग 5% , मध्यम वर्ग 10% ,निम्न मध्यम वर्ग 15% , अति निम्न मध्यम वर्ग 25% है. आप सोच रहे होंगे ,ये क्या बात हुई भला अचानक मध्यम वर्ग में एक नया श्रेणी बन गया और देश कि कुल जनसँख्या का एक चौथाई भी हो गया . ना तो यह अचानक हुआ है और ना हीं यह मेरी व्यक्तिगत बौधिकता कि उपज है . इसकी पुष्टि सरकार या योजना आयोग द्वारा बनाई गयी समितियां भी करती है .तेंदुलकर समिति या अन्य समिति जो कहती हैं कि देश में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करनेवालों कि संख्या 65 से 80% के बीच है, अब गरीबी रेखा के 40% के वर्तमान संख्या के बाद कोई और नहीं हैं ये हीं निम्न और अति निम्न मध्यम वर्ग के लोग हैं . और मध्यम वर्ग के निचले पायदान पर मौजूद इन्ही दो श्रेणियों के लोग “असल आम आदमी” हैं, जिनके ऊपर हर प्रकार के आर्थिक हलचलों का सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है . “आम आदमी” तो सार्वजानिक बोलचाल में प्रयुक्त होता है ,आपस कि बातचीत मे अंग्रेजी का एक उपहासात्मक जुमला “मैंगो पीपुल” इस्तेमाल होता है .
मध्यम वर्ग के इसी वर्गीकरण और स्वयं को मध्यम वर्ग में बनाये रखने के जद्दोजहद के हीं भीतर छुपे हैं वो तत्व या कारण जिसके परिणामस्वरूप आर्थिक उदारीकरण के समर्थक पूर्व एवं शायद भावी वित्तमंत्री पानी कि बोतल या आइसक्रीम खरीदने और अनाज या सब्जी ,दूध या पेट्रोलियम के दाम बढ़ने पर हंगामा करने का ताना देते हैं .या शरद यादव जैसे समाजवादी कार या मोटरसाईकल औए कंप्यूटर इत्यादि खरीदने का उलाहना देते हैं . ये तो एक बानगी है . इन उलाहनों या कहें मजाक का आधार क्या है ? वो है समग्र मध्यम वर्ग जिसमें मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग के वो लोग भी आते हैं जिनकी सालाना आमदनी 10 लाख से लेकर 1 करोड़ तक या शायद ज्यादा भी है . अब स्वाभाविक है कि उच्च मध्यम वर्ग हर तरह के आधुनिक सुख-सुविधाओं का उपभोग आसानी से करने में सक्षम है . 4-5 कमरों के या उससे भी थोड़े बड़े हर प्रकार के सुख सुविधाओं से युक्त “अपने” घर में रह सकते हैं . और आम जिन्दगी में लगभग वो सभी सुविधाएँ जो मुख्य उच्च वर्ग के लोग इस्तेमाल करते हैं , ये भी कर सकते हैं .आर्थिक हलचल इनके निवेश योजनाओं को तो प्रभावित कर सकता है पर इनका दैनन्दिनी अप्रभावित ही रहेगा . मध्यम वर्ग कि दूसरी श्रेणी “मध्यम वर्ग” कशमकश में तो ये भी होते हैं क्योंकि इनका  निवास उच्च मध्यम वर्ग के आस पास ही रहता है .ऐसे में इन्हें उनके स्तर के साथ सामंजस्य बिठाने कि ललक भी  होती है और थोड़ी मज़बूरी भी .हाँ ये इतने सक्षम तो होते हीं हैं कि सामान्य भौतिक संसाधनों का उपभोग कर सकें. इसप्रकार मध्यम वर्ग के ये दोनों श्रेणी के लोग उन सुविधाओं का इस्तेमाल करते हैं जिनका जिक्र माननीय मंत्री या शरद यादव जी ने किया . यहाँ प्रश्न उठता है कि क्या ये 15% लोग बांकी के 40% लोगों का प्रतिनिधित्व कर सकते है .  
आपको लग रहा होगा कि मैं शहरों कि बात कर रहा हूँ . हाँ , अभी मैं शहरो कि हीं बात कर रहा हूँ क्योंकि उलाहना देनेवाले और मजाक उड़ानेवाले ऐसे बयान शहरी आम आदमी को केन्द्र मे रखकर हीं दिए गए हैं . अब जरा मध्यम वर्ग के निचली दो श्रेणियों कि अर्थव्यवस्था और जीवन स्तर की पड़ताल कर लेते हैं . इनमे निम्न मध्यम वर्ग में ज्यादातर निचले स्तर के सरकारी कर्मचारी और मध्य स्तर के बिना मलाईदार पदों पर काम करनेवाले सरकारी कर्मचारी ,निजी क्षेत्र में मध्य स्तर के ज्यादातर कर्मचारी शामिल हैं . ये ज्यादातर किराये के मकान में रहते हैं . दैनिक आवश्यकताओं कि पूर्ति करने में , बच्चों के उज्जवल भविष्य के प्रयास में उनको स्तरीय शिक्षा देने कि जद्दोजहद में लगे लोग हैं . कार्य की प्रकृति के अनुसार व्यक्तिगत वाहन ले तो ले अन्यथा सार्वजानिक यातायात के साधनों का हीं इस्तेमाल करते हैं .बच्चों के भविष्य , उनके शादी व्याह की चिंताओं में हीं इतने उलझे होते हैं की क्या विलासिता की वस्तुओं का इस्तेमाल करें . मंत्री महोदय या उन जैसी सोंच रखनेवाले लोग कहते हैं ,क्रयशक्ति बढ़ गयी है , तनख्वाह बढ़ गयी है . अरे जनाब कितनी बढ़ गयी है ? क्या आपको पता भी है कि देश के सभी शहरों मे मकान का किराया पिछले दो सालों में 20% से ज्यादा बढ़ गया है . अन्य सभी आवश्यक आवश्यकताओं कि वस्तुओं के दाम में भी 15 से 25% तक कि वृद्धि हुई है .पेट्रोलियम पदार्थों एवं अन्य संसाधनों की कीमत भी 15 से 35% तक बढ़ गए .इनके बच्चों के बेरोजगारी कि समस्याएं भी हैं. अब हमारे माननीय लोग हीं बताएं कि इनकी क्रय शक्ति बढ़ी है या घटी है ?यह वर्ग  आर्थिक हलचलों ,बढती महंगाई और बच्चों की बेरोजगारी के परिणामस्वरूप बड़ी तेजी से मध्यम वर्ग के सबसे निचले पायदान कि ओर जा रहा है .इसे लेकर ये समूह पहले हीं बहुत व्यथित है ,जो शांतिपूर्ण आंदोलनों में इनकी भागीदारी के रूप में दिखने लगी है . हमारे नीतिनियंता ऐसे बयानों के द्वारा इनके ज़ख्मों को कुरेद रहे हैं बजाय मरहम लगाने के . सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वहन हीं इन पर पहाड़ की तरह गिरता है .ये क्या पानी की बोतल खरीदकर पियेंगे या रोज आइसक्रीम खायेंगे .
अब रहा अति निम्न मध्यम वर्ग . इस वर्ग में ज्यादातर निजी क्षेत्र में निचले स्तर पर कार्य करनेवाले लोग हैं और व्यापारिक प्रतिष्ठानों में कार्य करने वाले लोग हैं . स्वरोजगारी पेशेवर लगभग मध्यम वर्ग के सभी श्रेणी में हैं ,स्वाभाविक है इसमें भी होंगे . इन लोगों की आयसीमा 1लाख से 3 लाख तक है .चकाचौंध से भरी पत्रकारिता जगत के भी प्रारंभिक स्तर के लोग इसी श्रेणी में हैं . अविकसित या अर्धविकसित आवासीय क्षेत्रों में रहने वाले इन लोगों के आमदनी का 25% तक माकन का किराया देने में खर्च होता है .फिर बच्चों की शिक्षा इनकी प्राथमिकता मे ऊपर होने के कारण बड़ा हिस्सा सामान्य स्तर की शिक्षा देने में निकल जाता है .इसके बाद बड़ी मुश्किल से तो ये अतिआवश्यक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं. सामान्य आवश्यकताओं के लिए भी व्रत या त्योहारों का इंतजार होता है और कई बार वो भी मज़बूरी बन जाती है . सरकार के बजट की तरह इनका बजट भी घाटे में हीं चलता है . इस घाटे की भरपाई विश्व बैंक की तरह बगल का किराना दुकानदार करता है और बदले में हर सामान की कीमत मे १०% तक ज्यादा बढा लेता है . एक तो इनका वेतन जल्दी बढ़ता नहीं और अगर बढ़ता है तो उतना नहीं जितना घरेलु इस्तेमाल के सामानों का दाम बढ़ जाता . इनकी व्यथा बड़ी दारुण है .सम्भव है कभी आइसक्रीम खरीद लेते हों पर वो बच्चे के लिए हीं ,बांकी का पूरा परिवार अपने बच्चे को खता देखकर हीं उसका स्वाद महसूस कर लेगा .15 रूपये में संसद के भोजनालय में विभिन्न व्यंजनों से भरा थाली खाने वालों को शायद पता भी नहीं होगा की बाहर 15 रूपये में सिर्फ 3 कुलचे और एक दोना छोला मिलता है . निम्न और अतिनिम्न वर्ग के लोग बोतल का पानी नहीं पीते ,ये घर मे सरकारी नलकों से निकलने वाला संदिग्ध गुणवत्ता का और बाहर सड़क पर मिलने वाला पानी पीते है .कभी अख़बारों में नौकरी का विज्ञापन भी देख लें शरद जी ,वहाँ लिखा होता है “वाहन एवं लैपटॉप आवश्यक” .ये चीजें शौक के लिए नहीं ख़रीदे जाते ,एक अदद नौकरी इसका कारण हैं . संस्था के सबसे निचले पायदान पर होने के कारण सामान्यतया इनकी नौकरी अस्थायी ही रहती है ,पूर्णतया नियोक्ता के रहमो करम पर .इस श्रेणी के स्वरोजगारियों कि स्थिति बेरोजगारों जैसी हीं है . फिर वैसे बेरोजगार जो कतिपय कारणों से गरीबी रेखा के निचे नहीं हैं . 
इन परिस्थितियों के आलोक में उपरोक्त बयानों के उद्देश्य , प्रभाव एवं परिणाम के बरे में सोंचे . उपरोक्त बयान किसी एक चिदंबरम या शरद यादव कि सोंच नहीं है ,ज्यादातर राजनीतक समुदाय के लोग ऐसी हीं सोंच रखते हैं . कतिपय कारणों से मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग कि जमात के बुद्धिजीवी ,पत्रकारगण एवं सामाजिक कार्यकर्त्तागन भी उनकी हाँ मे हाँ मिलाते हैं . ये पढ़े लिखे ,शिक्षित लोग हैं ,जो उंदर हीं उंदर उबल रहे हैं .इसप्रकार के बयान आग में घी डालने का काम हीं कहा जायेगा . अभी तो ये सफल राजनीतिक कुचक्रों से जाती ,सम्प्रदाय में विभाजित हैं मगर जिस दिन ये शिक्षित 40% लोग संगठित होकर सडकों पर उतर गए या विद्रोही स्वर और तेवर अपना लिया तो क्या होगा ? शांत जल के भीतर उठ रही लहरों के शोर को शायद शासक , राजनीतिक और संभ्रांत वर्ग के लोग सुन नहीं रहे या स्वीकार नहीं कर रहे . अगर ये लहरें सतह पर आ गई और इस जमात ने विद्रोह का बिगुल फूंक दिया तो बीहड़ों और जंगलों में चल रही लड़ाई से भी भयानक होगी जो सभ्य समाज कि सड़कों पर लड़ी जायेगी . इस आंदोलन को कुचलना आसान भी नहीं होगा क्योंकि सशत्र बल के अग्रिम पंक्तियों के सिपाही भी इसी वर्ग समूह से आते हैं क्या वो अपने हीं भाई बंधुओं पर आसानी से लाठी गोली चला पाएंगे . अगर आप सहमत न हों तो जरा आज के दौर में छोटे बड़े अपराधों में पकडे जाने वाले युवाओं को और उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि को देख लें . सामाजिक परिस्थितियां , प्रशासनिकतंत्र , राजनीतिक उदासीनता और अवसर का अभाव इन युवाओं को बलात् इन दिशाओं मे धकेल रहे हैं . संभव है मेरा यह आलेख बगावती श्रेणी का माना जाये परन्तु इन परिस्थियों कि जिम्मेदारी कौन लेगा ?

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बुधवार, 11 जुलाई 2012

स्वतंत्रता के पुरोधाओं कि व्यथा


एक दिन भारत के प्रथम गृहमंत्री आदरणीय वल्लभ भाई पटेल मेरे सपने में आये , बहुत दुखी लग रहे थे. मैंने सादर अभिनन्दन कर उनसे पूछा, क्या बात है? आप इतने दुखी क्यों लग रहे हैं ? मेरे इतना पूछते हीं उनके वेदना कि धारा फूट पड़ी . कहने लगे क्या बताऊँ भारत कि दुर्दशा अब देखी नहीं जा रही .क्या यही दिन देखने के लिए नरमपंथियों ,हम जैसे मध्यमार्गियों और क्रांतिवीरों ने संघर्ष किया था ?  ये हमारा आज़ादी, 1857  से लेकर 1947 तक न जाने कितने या सच कहें तो अन अनगिनत लोगों के बलिदानों का प्रतिफल था . क्या क्या सपने देखे थे हमलोगों ने स्वतंत्र भारत के स्वरुप और हमारे  लोगो के विकास को लेकर . नारद मुनि जब पृथ्वी भ्रमण से लौटकर यहाँ कि बातें बताते हैं तो कलेजा फट जाता है . हमारे नेता को तो कोई दर्द है नहीं ,वो तो यहाँ भी ............. माउन्टबेटन के पीछे घूमते थे और वहां भी समविचार वाले देवराज के साथ लगे रहते हैं .बापू तो बस बटवारे कि
की सहमति देने से भी बड़ी गलती करने के दर्द से कोमा में ही चले गए हैं . अब मेरी चौंकने कि बारी थी . मैं तपाक से पूछ बैठा ,बटवारे से भी बड़ी गलती ?
उन्होंने एक ठंढ़ी आह भरी और कहने लगे , हाँ बटवारे से भी बड़ी गलती “अपने प्रिय शिष्य की प्रियदर्शिनी को अपना उपनाम देकर” . इन दोनों गलतियों कि सजा देश आज तक भुगत रहा है . एक भारत को बाहर से अपने सैनिक और भाड़े के सिपाहियों द्वारा परेशां करता रहता है . दूसरा खानदान भारत और यहाँ की जनता के कुंडली में कालसर्पयोग कि तरह बैठ गया है और वो भी बापू के उपनाम के सहारे . अब बेचारी भारत कि जनता गाँधी और काग्रेस के एहसानो से ऐसी लदी पड़ी है कि ये जानते हुए भी कि न ये असली गाँधी हैं और न ही आज कि कांग्रेस 127 साल पुरानी वो असली कांग्रेस .फिर भी जनता मुगालते मे आकर लोकतान्त्रिक तरीके से इनलोगों के राजतान्त्रिक सत्ता पर मुहर लगा देती है और फिर अगले 5 सालों तक अपने हीं पीठपर चाबुक चलने का अधिकार इन्हें दे देती है . अब पहली गलती में तो कुछ मज़बूरी भी रही हो सकती है ,पर इस दूसरी गलती का सदमा बापू बर्दास्त नहीं कर पाए . मेरी जिज्ञासा बढ़ रही थी कि तभी वो उठकर खड़े हो गए .मैंने पूछा क्या हुआ तो कहने लगे मन बहुत भारी हो गया है ,मैं फिर आऊंगा . और तभी अलार्म कि घंटी से मेरी नींद खुल गयी . मुझे पुनः उनसे मुलाकात का इंतजार रहेगा ,और मैं हमारी बातचीत आप तक भी पहुंचाऊंगा .......................... क्रमशः

रविवार, 10 जून 2012

अपने को एक बुरी बीमारी है ...सपने देखने की...तरह-तरह के सपने आते हैं क्या करूँ? कभी कोई सपना सच नहीं होता... पर एक दिन अपुन गरीब का भी एक सपना सच हो गया ........
.....एक रात मेरे सपने में आहलुवालिया जी आये ...अरे नहीं पहचाना क्या? अ..र..रेरे अपने मोंटेकसिंह जी ...बोले यार गंजे बड़ी फद्द हो रही हैं..
मैंने पुछा- किस बारे में .....?
वे बोले ...अरे उसी गरीबी वाली बात पे..../
मैं बोला... हा यार आपने तो हद्द ही कर दी ३५ रुपये में ....
.वो बीच मैं बात काट के बोले - मत याद दिला यार...सोच कित्ता कठीन काम है गरीब देश में ज्यादा गरीब ढूँढना.....अब सब को तो गरीब कह नहीं सकते ना... वर्ना जनता पूछती ६० साल से क्या झक मार रहे थे ....... ये कुछ ऐसा हि कठीन काम है.. जैसे कि रिजेक्टेड सड़े गले आलू–प्याज में से सेलेक्टेड आलू प्याज ढूँढना ..
मैंने हस के कहा ...यनी एक तो रिजेक्टेड और उसमें भी सेलेक्टेड
वो बोले ....ओफ्फ्फ्फ़ हाँ ....यार, बहुत प्लानिंग कि सर्वे किये ...ये पता करेने, कि कोई आदमी इस गरीब देश में गरीब कब कहलाये..., यहाँ तक कि, सर्वे के लिए राहुल बाबा को भी भेजा... गरीबों के घर...पर तू तो जानता ही हैं ना, वो तो मस्त खाना-विना खाए और खाट पे लंबी तान के सो गए, ...खैर छोड क्या बोलना उनके बारे... सारा देश जानता ही है......
मैंने उनकी परेशानी भाप ..हम्म में सर हिलाया/
वो बोले - यार कोई आईडिया-वीडिया देना, कैसे प्लानिंग करूँ....वाट लगी पड़ी हैं अपुन की...
मैंने उन्हें बीच में ही टोक कहा .... और देश की भी ...
वो बोले- छोड ना देश को ....कुछ आईडिया देना...
मैंने कहा ...किस बारे में?
वे बोले –प्लानिंग के बारे में...कैसे अच्छे और सच्चे प्लान बनाये ... 
मैं बोला ..भाई में क्या आईडिया दूँ ...मैं कुछ नहीं जानता प्लानिंग्-व्लानिग के बारे में ....
मोंटेकजी चुटकी ले बोले ... क्यों बे गंजे फेस बुक पे तो बड़ी लंबी-लंबी छोड़ता हैं, अब जब मैं कुछ आइडिया मांग रहा हूँ, तो साप सूंघ गए.....
मैंने अपने गंजे सर को खुजलाया, और मन ही मन सोचा, उधर फेस-बुक पे कुछ भी फेकने में क्या जाता हैं....सिवाए इन्टरनेट के बिल के ...पर इनको को क्या बोलू ....
मैंने कहा, भाई आप अपने मनु भाई से आईडिया लो ना, बड़े वाले इकोनोमिस्ट हैं वो... वे ही कुछ बतलायेंगे../
मोंटेकजी बोले...अब क्या कहूँ? वो तो पिछले ५-६ सालों से मौन व्रत पे हैं, कुछ भी पूछो... कुछ भी करो, कुछ बोलते ही नहीं ....बड़े संत पुरुष हैं/
मैंने कहा - तो किसी और से पूछो भाई...आप के पास...दीदी है ...दादा है.. अम्मा है मेरे पास क्या है?
वो गुस्से में तम-तमा के बोले, बस बस ...इसे पूछ.. उसे पूछ... खुद कोई जोम्मेदारी ना लेना ...देश इसी लिए तो आगे नहीं आ पा रहा है , सब को अधिकार चाहिए ...कोई कर्तव्य नहीं निभाना चाहता......./
मैंने सोचा, बाबा अगर आज मैंने इनको एक आईडिया नहीं दिया, तो देश कि लाइफ चेनज होने से रह जायेगी...
मैंने किसी कुशल डाक्टर के तरह पुछा अच्छा ...आपकी प्रॉब्लम क्या है..?
वो बोले – आईडिया ही नहीं आते ..प्लानिंग क्या ख़ाक करूँ.../ 
....उनकी बात सुन, अचानक मेरे दीमाग में एक बात आई... [बॉस अपना भेजा जब कभी क्रिएटिव वे में चलता है तो सिर्फ एक ही जगह पे, वो है - टॉयलेट, हो न हो इनके टॉयलेट में हि कुछ लोचा होगा जो आईडिया नहीं आ रहे,....] सो मैंने सवाल किया -बॉस आपका टॉयलेट कैसा हैं?
वो अजीब सा मुह बना के बोले, इस से तुम्हे क्या मतलब भाई?
मैंने कहा –सिर्फ ये कहो कि टॉयलेट कैसा है? 
वो बड़े दुखी हो बोले - क्या कहूँ बहुत बुरा है..
मैं मन ही मन खुश हुआ, सोचा चलो, अब आईडिया चीटका सकता हूँ,
मैंने पुछा -क्यों ?
वे बोले ...क्या करे? जब भी नया अच्छा टॉयलेट बनाते हैं, उसमे से कोई ना कोई लोटा और बाकी सामान चुरा भाग जाता है...
मैंने आश्चर्य से उनकी ओर देख पुछा ...आपके ऑफिस..... मेरा मतलब है कि, सरकारी महकमे में भी लुटिया चोट्टे होते हैं क्या?
वो शर्मा के बोले ....बस क्या गंजे भाई... आप भी ना .....फिरकी लेते हो ... हमारे यहाँ को छोड और कहा होते?
मैंने कहा भाई आप कि प्रॉब्लम का झक्कास सोलुशन मिल गया ...
वो खुश होगये और बोले ..क्या ?
मैंने कहा बॉस आप खुद के लिए और आपके पट्ठो के लिए सुपर-डुपर टॉयलेट बना डालिए
वो तुनक के बोले ...उस से क्या होगा? ये भी भला कोई हल हुआ ?
मैंने उन्हें अपना सीक्रेटे ज्ञान झाड़ा .... कि अच्छा टॉयलेट ही, अच्छे आईडिया कि जन्म स्थली है.. 
उन्होंने संदेह जताया ....पर फिर से कोई लोटा और टॉयलेट का सामान चुरा ले गया तब ?
मैंने कहा- सी सी टीवी कैमरा लगा दो...
वो बोले -अंदर ...?
मैंने कहा- अरे नहीं भाई, दरवाजे पे, ताकि कोई लुटिया या और सामान चुराए तो पकड में आजाये/
वो बेहद खुश हो गये और गले लगा बोले... वाह क्या आईडिया हैं सरजी....
मैंने कहा भाई... ये आईडिया तो देश कि लाइफ चेनज कर दे गा ना...?
वो बोले भाई कर तो सकता है बशर्ते ये ही सरकार अगली बार बने , क्यों कि प्लानिंग करते-करते एक दो साल तो लग हि जायेंगे, और तब तक हो सकता है नई सरकार बन जाये, क्यों कि अभी के इनके कर्म देखते हुए तो ये नहीं लगता कि ये ही सरकार रहेगी... फिर नयी सरकार नयी प्लानिग...पर हाँ अगर ये ही सरकार रही तो देश कि पक्के में लाइफ चेनज ...
और बस तभी मेरी आँख खुल गई ... सामने अखबार रखा था जिस पे ...एक हेड लाइन चमक रही थी “३५ लाख का टॉयलेट ......”  विवेक ........एक फेसबुक मित्र के पोस्ट से साभार