शनिवार, 9 मई 2020

मरूभूमि बना बिहार , संपूर्ण क्रांति आंदोलन अब संभव नहीं !

सार्वजनिक_शिक्षा_और_स्वास्थ्य के साथ सार्वजनिक परिवहन जैसी मौलिक आवश्यकता की सुविधाओं के लचर होने, रोजगार और कृषि क्षेत्र में सुविधाओं के अभाव के बावजूद देश या बिहार का नागरिक समाज या छात्र - युवा आंदोलित क्यों नहीं हो रहा ? बुद्धिजीवी वर्ग और नागरिक समाज सबके सब चुपचाप क्यों बैठे हैं ? कभी सोचा है आपने ?  आइए जरा इन तथ्यों पर गौर करें-

सपूर्ण_क्रांति_आंदोलन का प्रसार बिहार से शुरू होकर पूरे देश को प्रभावित करने में सफल हुआ। देश के तमाम राज्यों सहित केन्द्रीय सत्ता में भी परिवर्तन का कारण बना। इसी प्रकार इस आंदोलन के निहितार्थ ने भी राष्ट्रीय स्तर अपना प्रभाव छोड़ा। सभी राजनीतिक दलों ने इन इस आंदोलन के निहितार्थों से सीख लिया होगा। कांग्रेस तो खैर उस आंदोलन से प्रभावित हीं हुई थी पर निश्चित रूप से सफल हुए राजनीतिक समूहों ने भी सफलता के कारकों पर विचार किया होगा। तब से आज तक लगभग सभी ने बारी बारी से राज्यों से लेकर केन्द्र तक शासन किया है। आज भी कमोबेश पूरे भारत में संपूर्ण क्रांति की उपज हीं शासन कर रहे हैं। संपूर्ण क्रांति आंदोलन के बाद एक बहुत मजेदार तथ्य उभरकर सामने आया है वो यह कि भारत में मौजूद सभी राजनीतिक दलों के बीच लाख असहमतियों के बावजूद कुछ बातों के लिए जबरदस्त सहमति है उनमें से प्रमुख हैं , #जनता_की_निष्ठा खरीदने के लिए राजकीय कोष का दुरूपयोग करने की छूट , #अपने_सुविधाओं में मनमानी बढ़ोतरी के लिए अविश्वसनीय एकता तथा #येन_केन_प्रकारेण जनता को बांट कर सत्ता का पासिंग द बॉल का खेल खेलना। हकीकत यही है कि उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे सत्ता में हैं या विपक्ष में। सारी धींगामुश्ती सिर्फ अपने-अपने समर्थकों को अपने पाले में रखकर नागरिकों को बांटे रखने की है।

#बिहार_में_भी_सम्पूर्ण_क्रांति के छात्र और नागरिक आंदोलन की उपज , छात्रों , शिक्षित बुद्धिजीवियों और नागरिकों के एकीकृत आंदोलन की ताकत समझ गए थे। इसलिए अपनी सत्ता को बरकरार रखने के लिए पहले तो इन लोगों ने नागरिकों को खंड खंड में विभाजित किया तथा छोटे छोटे लाभ देकर नैतिक रूप से कमजोर किया। प्रतिक्रियात्मक रुप से अलग अलग ध्रुव बन गए। क्रमशः #हम_भारत_के_लोग, नागरिक से समर्थक और विरोधी बनते चले गए ।
दूसरी तरफ छात्रों को कमजोर करने के लिए शिक्षा के स्तर को गिराया गया , साथ हीं शिक्षा पद्धति को भी वस्तुनिष्ठ बनाकर विश्लेषण की पूरी क्षमता को खत्म कर दिया । शैक्षणिक संस्थानों को डिग्री बांटने और उसके बाद वोट बैंक को लुभाने वाला केन्द्र बना दिया गया। विस्तृत दृष्टि के अभाव में सामाजिक विभाजन गहरा प्रभाव इन पर भी पड़ता चला गया। इन सबके कारण छात्र अब विचार नहीं करते , बस दिए गए विचारों का प्रसार करते हैं।
#छात्रों_और_प्रबुद्ध वर्ग के लोगों और नागरिकों को लोकतांत्रिक राजनीतिक दलों और उनके द्वारा पोषित मिडिया वर्ग द्वारा #वोट_बैंक के रूप में संबोधित करके किया जाने वाला अपमान समझ में आता है भी या नहीं ? बैंक तो समझ आता है ना ? आप उनके बैंक खाते में जमा वोट हैं , तात्पर्य यह कि आप उनकी संपत्ति है , नागरिक समाज धीरे धीरे इनके जाल में उलझकर #भारतीय_संविधान_की_प्रस्तावना के पहले पंक्ति में वर्णित #हम_भारत_के_लोग नहीं रहे ।
#राजनीतिक_दलें मदारियों की तरह , जाति , धर्म , राष्ट्र , क्षेत्रिय/भाषाई अस्मिता आदि तरह तरह के मनभावन तमाशों में हमें उलझाकर , अपने समुदाय ( राजनैतिज्ञ) के लिए स्वार्थसिद्धि  का मार्ग निष्कंटक बनाने में सफल हो जाते हैं।
#नागरिक_समाज_अपने_ही_पूर्वजों द्वारा दी गई शिक्षा को भूल गए। महाराणा प्रताप, शिवाजी, बाबू कुंवर सिंह , झांसी की रानी, मंगल पांडे के साथ-साथ बहादुर शाह जफर के संघर्ष को भूल गए। चाणक्य की शिक्षाओं को भूल गए। महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, चंद्र शेखर आजाद, बल्लभ भाई पटेल और भगत सिंह के संघर्षों को भूल गए। सामाजिक उत्थान के लिए पेरियार और ज्योतिबा फूले द्वारा दी गई शिक्षाओं को भूल गए हैं तो वहीं मदन मोहन मालवीय और सैयद अहमद खान द्वारा बताए गए शिक्षा के महत्व को भी भूल गए हैं। बाबासाहेब आंबेडकर के संघर्षों को भूल गए हैं उनके द्वारा उपलब्ध कराए गए संवैधानिक अधिकारों को भूल गए हैं। डॉ राजेंद्र प्रसाद और जयप्रकाश नारायण का दृढ़ निश्चय भूल गए हैं। रामधारी सिंह दिनकर , दुष्यंत और गोपाल सिंह नेपाली के संघर्षों का आह्वान भूल गए हैं।

वक्त आ गया है कि भारत के नागरिक एक बार फिर अपने इन पूर्वजों के द्वारा दी गई शिक्षाओं को याद करें , उस पर अमल करें क्योंकि उनके द्वारा बताए गए मार्ग पर चलकर ही आप अपने समाज , राज्य और देश को सशक्त बना सकते हैं , विकसित बना सकते हैं।

अमित कुमार

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी बातों मै सच्चाई है और पुरनरूपेन सहमत हूं ।समाधान के लिए कदम उठाना ही पड़ेगा ।वरना समस्या वही की वही धरी रह जाएंगी ।इसके लिए ईमानदार लोगो को और हर तरह के गुनी जनों को संगठित होना पड़ेगा वह भी निस्वार्थ भाव से और देश प्रेम से ओत प्रोत भावना से ।वैसे उनलोगो की संख्या अत्यधिक है जो ऐसी बातों को बेवकूफी कहते और संसार को नरक बनाने में कामयाब हो रहे है ।धीरज ईमानदारी और दूरदृष्टी यही कामयाबी के सूत्र है । शशि कुमारी सिंह अध्यक्षा रसायन विभाग

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