राजनीतज्ञों के
जुमलों में एक खास प्रकार के प्राणी कि चर्चा होती है .आपको पता है वो कौन है ?
अरे साहब हम में से हर किसी ने कई बार सुना होगा ,उस प्राणी को आम आदमी कहते है .
कभी इसको पुचकारा जाता है ,तो कभी दुत्कारा और ललकारा जाता है .कभी इसके शारीर और
आत्मा पर ढेरों घाव दिए जाते हैं, तो कभी उन्ही घावों पर मरहम लगाने का अभिनय किया
जाता है . जैसा की हम सभी जानते हैं कि सामाजिक हैसियत के आधार पर समाज को तीन
मुख्य वर्गों में बांटा गया है ,उच्च वर्ग ,मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग . सामाजिक
वर्गीकरण में इस बेचारे प्राणी को मध्यम वर्ग भी कहते हैं . अब आप सोंचेंगे कि ठीक
हीं तो है उच्च वर्ग में न सही , मध्यम वर्ग में तो है . कम से कम निम्न वर्ग में
तो नहीं है ,इसमें व्यथित होने कि क्या बात है ? भाई साहब व्यथा का मूल इ़सी में
तो निहित है. सच ये है कि आम आदमी को आज तक सही तरीके से परिभाषित हीं नहीं किया
गया . विडम्बना ये है कि ये एकमात्र ऐसे वर्ग में रखे गए हैं जिस वर्ग के अन्दर भी वर्गीकरण है .
भारत की जनसँख्या मे
उच्च वर्ग का अनुपात बमुश्किल 5% है और उन्हें किसी भी तरह के आर्थिक उठापटक
,मुद्रस्फिर्ती या महंगाई दर से सिर्फ उनकी आर्थिक हैसियत पर थोड़ा बहुत असर पड़ता
है अन्यथा प्रभावहीन हीं रहता है . निम्न वर्ग या कहें “गरीबी रेखा के निचे” .सरकारी
शब्दावली में असंगठित क्षेत्र के मजदूर एवं अन्य . भारत जैसे साम्यवादी,समाजवादी
अवधारणा को अंगीकार करनेवाले लोकतंत्र में केंद्र या राज्य सरकारों के लगभग 80%
योजनाओं का लक्षित समूह . 35 लाख का प्रशाधन कक्ष बनाने वाली सरकारी संस्था के
अनुसार देश कि कुल आबादी का 35 से 40% गरीबी रेखा के निचे है यानि इस वर्ग में है
. अब ये अलग एक विवाद का मुद्दा हो सकता है कि इस समूह के निर्धारण कि विधि सही है
या नहीं ,योजनाओं का लाभ उन तक पहुँच पता है या नहीं, वो योजनाएं उनके वास्तविक उन्नति के लिए बनाई जाती हैं या उन्हें पराश्रित बनाने की दिशा में बढ़ाती है या उनकी निष्ठा खरीदने के लिए इत्यादि इत्यादि . पर ये तो
निश्चित है कि आर्थिक विकास के साये से दूर तमाम हलचलों की मार झेलते हुए अपनी जिंदगी जीने की जद्दोजहद में लगे रहते हैं। . ये दोनों वर्ग, एक आसमान है
तो दूसरा ज़मीन परन्तु एक बात दोनों मे
सामान है ,वो ये कि इन दोनों वर्गों के भीतर कोई उपवर्ग नहीं है .
आम आदमी का वर्ग
“मध्यम वर्ग” . देश कि कुल जनसँख्या का 55% . सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं मे
अफसर से लेकर चपरासी तक , बड़े से लेकर मझोले और छोटे किसान , एक बड़े ब्रांड कि बड़ी
दुकान चलानेवाले से लेकर किराना कि छोटी दुकान चलानेवाले तक , एवं ऐसे स्वरोजगारी
भी जिनके आमदनी कि निश्चितता नहीं है, ये सभी इसी वर्ग में आते हैं. अपने विस्तृत
आयाम के कारण शुरू से हीं यह वर्ग दो भागों मे विभक्त था .उच्च मध्यम वर्ग और
निम्न मध्यम वर्ग .आर्थिक उदारीकरण के दौड़ ने इसमें एक और वर्ग बना दिया ,अब उच्च
और निम्न मध्यम वर्ग के बीच एक (सामान्य) मध्यम वर्ग आ गया . हमारे नीतिनियंता अब
औपचारिक ,अनोपचारिक बातचित में उच्च मध्यम वर्ग ,मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग
कि अवधारणा को स्वीकार करते हैं या बातचीत में इस्तेमाल करते हैं . मैं समझाता हूँ
और शयद आप भी सहमत होंगे कि विगत समय में इसमें एक और श्रेणी जुड गया है ,वो है
अतिनिम्न मध्यम वर्ग . वर्तमान में मध्यम वर्ग में चार श्रेणी हैं .उच्च मध्यम
वर्ग ,मध्यम वर्ग , निम्न मध्यम वर्ग और अति निम्न मध्यम वर्ग . अगर इन चारो
श्रेणियों को प्रतिशत में विभक्त करे तो उच्च मध्यम वर्ग 5% , मध्यम वर्ग 10%
,निम्न मध्यम वर्ग 15% , अति निम्न मध्यम वर्ग 25% है. आप सोच रहे होंगे ,ये क्या
बात हुई भला अचानक मध्यम वर्ग में एक नया श्रेणी बन गया और देश कि कुल जनसँख्या का
एक चौथाई भी हो गया . ना तो यह अचानक हुआ है और ना हीं यह मेरी व्यक्तिगत बौधिकता
कि उपज है . इसकी पुष्टि सरकार या योजना आयोग द्वारा बनाई गयी समितियां भी करती है
.तेंदुलकर समिति या अन्य समिति जो कहती हैं कि देश में गरीबी रेखा से नीचे जीवन
यापन करनेवालों कि संख्या 65 से 80% के बीच है, अब गरीबी रेखा के 40% के वर्तमान
संख्या के बाद कोई और नहीं हैं ये हीं निम्न और अति निम्न मध्यम वर्ग के लोग हैं .
और मध्यम वर्ग के निचले पायदान पर मौजूद इन्ही दो श्रेणियों के लोग “असल आम आदमी”
हैं, जिनके ऊपर हर प्रकार के आर्थिक हलचलों का सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है . “आम
आदमी” तो सार्वजानिक बोलचाल में प्रयुक्त होता है ,आपस कि बातचीत मे अंग्रेजी का
एक उपहासात्मक जुमला “मैंगो पीपुल” इस्तेमाल होता है .
मध्यम वर्ग के इसी
वर्गीकरण और स्वयं को मध्यम वर्ग में बनाये रखने के जद्दोजहद के हीं भीतर छुपे हैं
वो तत्व या कारण जिसके परिणामस्वरूप आर्थिक उदारीकरण के समर्थक पूर्व एवं शायद
भावी वित्तमंत्री पानी कि बोतल या आइसक्रीम खरीदने और अनाज या सब्जी ,दूध या
पेट्रोलियम के दाम बढ़ने पर हंगामा करने का ताना देते हैं .या शरद यादव जैसे
समाजवादी कार या मोटरसाईकल औए कंप्यूटर इत्यादि खरीदने का उलाहना देते हैं . ये तो
एक बानगी है . इन उलाहनों या कहें मजाक का आधार क्या है ? वो है समग्र मध्यम वर्ग
जिसमें मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग के वो लोग भी आते हैं जिनकी सालाना आमदनी 10 लाख
से लेकर 1 करोड़ तक या शायद ज्यादा भी है . अब स्वाभाविक है कि उच्च मध्यम वर्ग हर
तरह के आधुनिक सुख-सुविधाओं का उपभोग आसानी से करने में सक्षम है . 4-5 कमरों के
या उससे भी थोड़े बड़े हर प्रकार के सुख सुविधाओं से युक्त “अपने” घर में रह सकते
हैं . और आम जिन्दगी में लगभग वो सभी सुविधाएँ जो मुख्य उच्च वर्ग के लोग इस्तेमाल
करते हैं , ये भी कर सकते हैं .आर्थिक हलचल इनके निवेश योजनाओं को तो प्रभावित कर
सकता है पर इनका दैनन्दिनी अप्रभावित ही रहेगा . मध्यम वर्ग कि दूसरी श्रेणी “मध्यम
वर्ग” कशमकश में तो ये भी होते हैं क्योंकि इनका निवास उच्च मध्यम वर्ग के आस पास ही रहता है
.ऐसे में इन्हें उनके स्तर के साथ सामंजस्य बिठाने कि ललक भी होती है और थोड़ी मज़बूरी भी .हाँ ये इतने सक्षम
तो होते हीं हैं कि सामान्य भौतिक संसाधनों का उपभोग कर सकें. इसप्रकार मध्यम वर्ग
के ये दोनों श्रेणी के लोग उन सुविधाओं का इस्तेमाल करते हैं जिनका जिक्र माननीय
मंत्री या शरद यादव जी ने किया . यहाँ प्रश्न उठता है कि क्या ये 15% लोग बांकी के 40% लोगों का प्रतिनिधित्व कर सकते है .
आपको लग रहा होगा कि
मैं शहरों कि बात कर रहा हूँ . हाँ , अभी मैं शहरो कि हीं बात कर रहा हूँ क्योंकि
उलाहना देनेवाले और मजाक उड़ानेवाले ऐसे बयान शहरी आम आदमी को केन्द्र मे रखकर हीं
दिए गए हैं . अब जरा मध्यम वर्ग के निचली दो श्रेणियों कि अर्थव्यवस्था और जीवन
स्तर की पड़ताल कर लेते हैं . इनमे निम्न मध्यम वर्ग में ज्यादातर निचले स्तर के सरकारी
कर्मचारी और मध्य स्तर के बिना मलाईदार पदों पर काम करनेवाले सरकारी कर्मचारी
,निजी क्षेत्र में मध्य स्तर के ज्यादातर कर्मचारी शामिल हैं . ये ज्यादातर किराये
के मकान में रहते हैं . दैनिक आवश्यकताओं कि पूर्ति करने में , बच्चों के
उज्जवल भविष्य के प्रयास में उनको स्तरीय शिक्षा देने कि जद्दोजहद में लगे लोग हैं
. कार्य की प्रकृति के अनुसार व्यक्तिगत वाहन ले तो ले अन्यथा सार्वजानिक यातायात
के साधनों का हीं इस्तेमाल करते हैं .बच्चों के भविष्य , उनके शादी व्याह की
चिंताओं में हीं इतने उलझे होते हैं की क्या विलासिता की वस्तुओं का इस्तेमाल करें
. मंत्री महोदय या उन जैसी सोंच रखनेवाले लोग कहते हैं ,क्रयशक्ति बढ़ गयी है ,
तनख्वाह बढ़ गयी है . अरे जनाब कितनी बढ़ गयी है ? क्या आपको पता भी है कि देश के
सभी शहरों मे मकान का किराया पिछले दो सालों में 20% से ज्यादा बढ़ गया है . अन्य
सभी आवश्यक आवश्यकताओं कि वस्तुओं के दाम में भी 15 से 25% तक कि वृद्धि हुई है .पेट्रोलियम
पदार्थों एवं अन्य संसाधनों की कीमत भी 15 से 35% तक बढ़ गए .इनके बच्चों के
बेरोजगारी कि समस्याएं भी हैं. अब हमारे माननीय लोग हीं बताएं कि इनकी क्रय शक्ति
बढ़ी है या घटी है ?यह वर्ग आर्थिक हलचलों ,बढती
महंगाई और बच्चों की बेरोजगारी के परिणामस्वरूप बड़ी तेजी से मध्यम वर्ग के सबसे
निचले पायदान कि ओर जा रहा है .इसे लेकर ये समूह पहले हीं बहुत व्यथित है ,जो
शांतिपूर्ण आंदोलनों में इनकी भागीदारी के रूप में दिखने लगी है . हमारे
नीतिनियंता ऐसे बयानों के द्वारा इनके ज़ख्मों को कुरेद रहे हैं बजाय मरहम लगाने के
. सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वहन हीं इन पर पहाड़ की तरह गिरता है .ये क्या पानी
की बोतल खरीदकर पियेंगे या रोज आइसक्रीम खायेंगे .
अब रहा अति निम्न
मध्यम वर्ग . इस वर्ग में ज्यादातर निजी क्षेत्र में निचले स्तर पर कार्य करनेवाले
लोग हैं और व्यापारिक प्रतिष्ठानों में कार्य करने वाले लोग हैं . स्वरोजगारी
पेशेवर लगभग मध्यम वर्ग के सभी श्रेणी में हैं ,स्वाभाविक है इसमें भी होंगे . इन
लोगों की आयसीमा 1लाख से 3 लाख तक है .चकाचौंध से भरी पत्रकारिता जगत के भी
प्रारंभिक स्तर के लोग इसी श्रेणी में हैं . अविकसित या अर्धविकसित आवासीय
क्षेत्रों में रहने वाले इन लोगों के आमदनी का 25% तक माकन का किराया देने में
खर्च होता है .फिर बच्चों की शिक्षा इनकी प्राथमिकता मे ऊपर होने के कारण बड़ा हिस्सा
सामान्य स्तर की शिक्षा देने में निकल जाता है .इसके बाद बड़ी मुश्किल से तो ये
अतिआवश्यक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं. सामान्य आवश्यकताओं के लिए भी व्रत या
त्योहारों का इंतजार होता है और कई बार वो भी मज़बूरी बन जाती है . सरकार के बजट की
तरह इनका बजट भी घाटे में हीं चलता है . इस घाटे की भरपाई विश्व बैंक की तरह बगल
का किराना दुकानदार करता है और बदले में हर सामान की कीमत मे १०% तक ज्यादा बढा
लेता है . एक तो इनका वेतन जल्दी बढ़ता नहीं और अगर बढ़ता है तो उतना नहीं जितना
घरेलु इस्तेमाल के सामानों का दाम बढ़ जाता . इनकी व्यथा बड़ी दारुण है .सम्भव है
कभी आइसक्रीम खरीद लेते हों पर वो बच्चे के लिए हीं ,बांकी का पूरा परिवार अपने
बच्चे को खता देखकर हीं उसका स्वाद महसूस कर लेगा .15 रूपये में संसद के भोजनालय
में विभिन्न व्यंजनों से भरा थाली खाने वालों को शायद पता भी नहीं होगा की बाहर 15 रूपये में सिर्फ 3 कुलचे और एक दोना छोला मिलता है . निम्न और अतिनिम्न वर्ग के
लोग बोतल का पानी नहीं पीते ,ये घर मे सरकारी नलकों से निकलने वाला संदिग्ध
गुणवत्ता का और बाहर सड़क पर मिलने वाला पानी पीते है .कभी अख़बारों में नौकरी का
विज्ञापन भी देख लें शरद जी ,वहाँ लिखा होता है “वाहन एवं लैपटॉप आवश्यक” .ये
चीजें शौक के लिए नहीं ख़रीदे जाते ,एक अदद नौकरी इसका कारण हैं . संस्था के सबसे
निचले पायदान पर होने के कारण सामान्यतया इनकी नौकरी अस्थायी ही रहती है ,पूर्णतया
नियोक्ता के रहमो करम पर .इस श्रेणी के स्वरोजगारियों कि स्थिति बेरोजगारों जैसी
हीं है . फिर वैसे बेरोजगार जो कतिपय कारणों से गरीबी रेखा के निचे नहीं हैं .
इन
परिस्थितियों के आलोक में उपरोक्त बयानों के उद्देश्य , प्रभाव एवं परिणाम के बरे
में सोंचे . उपरोक्त बयान किसी एक चिदंबरम या शरद यादव कि सोंच नहीं है ,ज्यादातर
राजनीतक समुदाय के लोग ऐसी हीं सोंच रखते हैं . कतिपय कारणों से मध्यम और उच्च
मध्यम वर्ग कि जमात के बुद्धिजीवी ,पत्रकारगण एवं सामाजिक कार्यकर्त्तागन भी उनकी
हाँ मे हाँ मिलाते हैं . ये पढ़े लिखे ,शिक्षित लोग हैं ,जो उंदर हीं उंदर उबल रहे
हैं .इसप्रकार के बयान आग में घी डालने का काम हीं कहा जायेगा . अभी तो ये सफल
राजनीतिक कुचक्रों से जाती ,सम्प्रदाय में विभाजित हैं मगर जिस दिन ये शिक्षित 40%
लोग संगठित होकर सडकों पर उतर गए या विद्रोही स्वर और तेवर अपना लिया तो क्या होगा
? शांत जल के भीतर उठ रही लहरों के शोर को शायद शासक , राजनीतिक और संभ्रांत वर्ग
के लोग सुन नहीं रहे या स्वीकार नहीं कर रहे . अगर ये लहरें सतह पर आ गई और इस
जमात ने विद्रोह का बिगुल फूंक दिया तो बीहड़ों और जंगलों में चल रही लड़ाई से भी
भयानक होगी जो सभ्य समाज कि सड़कों पर लड़ी जायेगी . इस आंदोलन को कुचलना आसान भी
नहीं होगा क्योंकि सशत्र बल के अग्रिम पंक्तियों के सिपाही भी इसी वर्ग समूह से
आते हैं क्या वो अपने हीं भाई बंधुओं पर आसानी से लाठी गोली चला पाएंगे . अगर आप
सहमत न हों तो जरा आज के दौर में छोटे बड़े अपराधों में पकडे जाने वाले युवाओं को
और उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि को देख लें . सामाजिक परिस्थितियां , प्रशासनिकतंत्र ,
राजनीतिक उदासीनता और अवसर का अभाव इन युवाओं को बलात् इन दिशाओं मे धकेल रहे हैं
. संभव है मेरा यह आलेख बगावती श्रेणी का माना जाये परन्तु इन परिस्थियों कि
जिम्मेदारी कौन लेगा ?
बेहतरीन लेख सर
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
जवाब देंहटाएंबिल्कुल सटीक व सारगर्भित!
जवाब देंहटाएंहमको तो लगता ही नही की हम स्वतंत्र है या गुलाम या फिर इस दोनो के बीच झूलता एक आम आदमी जो खुद के या अपने परिवार के सुरक्षा एवं भरण पोषण के लिए इस तंत्र का गुलाम तक बनने के लिए तैयार रहता है।
जवाब देंहटाएंबिल्कुल सही भाई , 1947 में भारत जीता जरूर था लेकिन सत्ता इंडिया के संरक्षकों के हाथ चली गई । तबसे इंडिया के प्रतिनिधि हीं सत्ता संचालित करते हैं , चाहे सत्ता में कोई रहे ।
हटाएंसरकार हमेशा शोषणकर्ता ही होता हैं।
जवाब देंहटाएंकल सुबह की एक घटना बताता हूं। मेरी गली की जो सड़क है उसका भरपूर मज़ा मेरे गली का लोग उठाते है। मज़ा इसलिए कि मरम्मती के नाम पर कोई आगे नही आता, और ट्रैक्टर उसी सड़क से होते अपने दरवाजे तक चाहिए सबको। कल भी ऐसी ही एक बात हुई जब एक ट्रैक्टर को उसी सड़क से ले जाने की कवायद चल रही थी। मुझे पता नही ऐसा लग रहा था कि आज ये सड़क दम तोड़ देगी। एक मुखड़ा उसी वक़्त जेहन में आया-
जवाब देंहटाएं"जिसने-जैसे-जब भी चाहा, मुझको वैसे लूटा है।"
आपका ब्लॉग "पानी का बोतल , आइसक्रीम और आम आदमी की व्यथा" पढ़ा तो महसूस हुई कि ये मध्यम वर्ग दरअसल वही सड़क है।
MBA में हमे Marketing में पढ़ाया गया था कि product बेचने के लिए पहले अपना Target चुनो। एक Product पूरे परिवार के लिए नही हो सकता। या तो वो बाप ले लिए होगा या बेटे के लिए, या तो माँ उसकी उपभोक्ता बनेगी या बेटी तो पहले चुनो कि product बेचना किसे है। हम लोग वही Target है और product है "सपने", जिसे हमारी सरकारे बेचती आई है। जो कांग्रेस सरकार पहले रोजाना 30-32 रुपये खर्चने वाले को गरीब नही मानती थी, वही आज 6000 महीना देने की बात करती है। जो बीजेपी पहले सोनिया/वाड्रा को जेल में डालने की बात करती थी, उसके 6-7 साल के शासन के बाद भी आज ये परिवार देश का सबसे शक्तिशाली परिवार है। अब समझ मे आया कि दरअसल वो बाते, वो सपने ही तो product थे जो हमने ख़रीदे।
इस तरह के वर्गीकरण अपने-अपने वोट बैंक के लिए टारगेट है। लेकिन ये वर्गीकरण इतने पर ही नही रुकता। किसी के लिए हम "माई समीकरण" है तो किसी के लिए "भूरा बाल", किसी के लिए हम "भगवाधारी" तो किसी के लिए "Tax payer", कोई हमे "शोषक" समझता है। लेकिन हम है वहीं, गली की वो सड़क, जिसे भोगना तो सब चाहते है पर मरम्मत करना कोई नही चाहता।
"सुंदर आलेख अमित जी। साधुवाद जो आपने ऐसे मुद्दे को इतने सरल शब्दों में व्यक्त किया।"
अभिषेक वर्मा
ब्लाग की इससे बेहतर विवेचना शायद हीं हो सके। बस ऐसे हीं मुद्दे पर किसी भी सरकार के खिलाफ मुखर रहना शिक्षित नागरिक कर्त्तव्य है और हम तो चाणक्य के वंशज हैं।
हटाएंबेहतरीन लेख अमित भैया। तत्कालीन समस्या को बहुत ही बेहतरीन ढंग से उल्लेखित किए हुए हैं और यह आज भी उसी रूप में प्रासंगिक है।
जवाब देंहटाएंबहुत दुख की बात यह है इतनी मेधावी होने के बाद भी सरकार आपकी मेधा का सदुपयोग न करके दुरुपयोग कर रही है। तरह तरह के गैर शैक्षणिक कार्यों(जैसे खिचड़ी, पोषक, छात्रवृत्ति,जनगणना,पशु गणना,चुनाव,स्वच्छता अभियान आदि) में लगाकर सरकार मेधा का अपमान कर रही है। शिक्षकों का मुख्य कार्य छात्रों को शिक्षा देना होना चाहिए जबकि सरकार ठीक इसके उल्टा कर रही है। ऐसा नहीं है कि सरकार इन सब बातों से अनभिज्ञ हैं बल्कि यह सोची समझी साजिश है जिसे सार्वजनिक शिक्षा को ध्वस्त किया जा सके और मध्यम एवम् गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों के बीच से पुनः ऐसे अमित कुमार ना उभरे जो अपने वाजिब हक के लिए सत्ता से प्रश्न कर सके।
समाज और देश में जितने भी क्रांति और बदलाव हुई है उसमें शिक्षक एवम् साहित्यकारों की अहम भूमिका रही है। अब समय आ गया है कि शिक्षा और समाज को इस सामंतवादी विचारधारा वाली सरकार( चाहे वह किसी भी पार्टी या गठबंधन की सरकार हो) से बचाने के लिए हम सभी को आगे आना होगा नहीं तो सार्वजनिक शिक्षा इन दोनों वर्गों से सदा के लिए हाथ से निकल जाएगा। शिक्षा कॉरपोरेट घराना के हाथ में सौंप दिया जाएगा जहां इन दोनों वर्गों के बच्चे पढ़ने में सक्षम नहीं होंगे। उसके बाद हमारे समाज से मतदाता नहीं बल्कि सरकार के समर्थक पैदा होंगे और सरकार हमें लॉलीपॉप देती रहेगी एवम् हमें मौलिक अधिकारों से वंचित करती रहेगी।
मुकेश कुमार
आभार भाई , हम सब मिलकर इन विचारों को स्थापित करने का प्रयास करते रहेंगे।
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